कुण्डली/छंद

बसंत..

पीली पीली सरसों हैं खेतों की चुनर पीली
पीले रंग की खुमारी चहुं ओर छा गयी।
सोने जैसा हो गया है हरे खेतो का बदन
मदहोशी नई सी फिज़ाओं मे समा गयी।
पाती पाती है उमंग, मन उडे जूं पतंग
भंवरो को कली की जवानी भरमा गयी।
गाने लगे प्रीत गीत लुभाने को मनमीत
रानी श्रृतुओं की लो बसंत रानी आ गयी॥

हवा गाती मल्हार झूमने लगे चिनार
आते ही बसंत पेडों पे रवानी आ गयी
बलखाती बेलें झूमे पेडों का बदन चूमें
मुरझाए तरुओं पे भी जवानी छा गयी
डोलने लगे पतंगे बगिया में यहां वहां
श्रृतु आस मन में मिलन की जगा गयी
धानी चुनरी मे सजी धजी निखरी सी धरा
आयी जो बसंत दुल्हनियां बना गयी॥

हर्षित जन हुए मन में चमन हुए
मुस्काते लबों पे अलग ही निखार है
झूमने लगी प्रकृति तृण तृण हुई रती
चहुं ओर झूमती बहार ही बहार है
अठखेली करती चली है नदी वेग लिये
लहरों की तरंगो में उमंगे असवार है
यूं ही आना महारानी बनके हमारे देश
तुम से बसंत जिन्दगानी में बहार है॥

सतीश बंसल

*सतीश बंसल

पिता का नाम : श्री श्री निवास बंसल जन्म स्थान : ग्राम- घिटौरा, जिला - बागपत (उत्तर प्रदेश) वर्तमान निवास : पंडितवाडी, देहरादून फोन : 09368463261 जन्म तिथि : 02-09-1968 : B.A 1990 CCS University Meerut (UP) लेखन : हिन्दी कविता एवं गीत प्रकाशित पुस्तकें : " गुनगुनांने लगीं खामोशियां" "चलो गुनगुनाएँ" , "कवि नही हूँ मैं", "संस्कार के दीप" एवं "रोशनी के लिए" विषय : सभी सामाजिक, राजनैतिक, सामयिक, बेटी बचाव, गौ हत्या, प्रकृति, पारिवारिक रिश्ते , आध्यात्मिक, देश भक्ति, वीर रस एवं प्रेम गीत.

4 thoughts on “बसंत..

  • विजय कुमार सिंघल

    अच्छी कविता !

    • सतीश बंसल

      शुकगरिया विजय जी..

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    पाती पाती है उमंग, मन उडे जूं पतंग

    भंवरो को कली की जवानी भरमा गयी। बहुत अच्छी पन्क्तिआन .

    • सतीश बंसल

      बहुत आभार आद. गुरमेल जी..

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