कविता

“जय माँ”

“कुंडलिया”

माँ तो माँ है मान मन, माँ ममता अनमोल
देखी दुनियां माँ बिना, धन्य धन्य वह बोल।।
धन्य धन्य वह बोल, शहद भी खट्टा लागे
कहाँ गई तूं छोड़, देख हम हुए अभागे
कह गौतम कविराय, करूँ किससे समता माँ
तुझको दूँ विसराय, पुकारूँ अब किसको माँ।-1

अंगुली पकड़ खड़ा हुआ, लेकर तेरा नाम
तेरी आँखों में मिला, मुझको मेरा धाम
मुझको मेरा धाम, पाया गुरू गोविंदा
लोरी का सुखधाम, कंठ कोकिल खगवृन्दा
कह गौतम कविराय, तुझे कस भूलूँ पगली
हिय में लियों बसाय, याद में पकडूँ अंगुली।।-2

मात दिवस तो रोज है, करूँ नित्य प्रणाम
बिन तेरे आशीष के, शुरू न करता काम
शुरू न करता काम, राम के संग आरती
हर बेला हर शाम, नमन करूँ मात भारती
कह गौतम कविराय, याद करते तुझे तात
कहते बात सुनाय, नहि भूले तोरी मात।।-3

सब कुछ है परिवार में, तेरी बगिया छांह
सच कहूँ नहीं मन भरे, मिटे न तेरी चाह
मिटे न तेरी चाह, राह में कटक अनेका
हो जाता गुमराह, द्वन्द अपनों का शोका
कह गौतम कविराय, जीवनी लीला है अब
मन संतोष न आय, बिहंगम मेला है सब।।-4

महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

*महातम मिश्र

शीर्षक- महातम मिश्रा के मन की आवाज जन्म तारीख- नौ दिसंबर उन्नीस सौ अट्ठावन जन्म भूमी- ग्राम- भरसी, गोरखपुर, उ.प्र. हाल- अहमदाबाद में भारत सरकार में सेवारत हूँ