गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : पिला दी हुस्न की हाला

दीदारे यार आया था पिला दी हुस्न की… ..हाला ,
दस्त से गिर गई हाला लबों पे तिर गई…. हाला |
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कटोरे नैन भर पी ली है मदिरा प्रेम की… जिसने ,
चढ़ेगी क्या उसे फिर इस जहाँ की कोई भी .हाला |
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समंदर में तू उतरी पर समंदर को मिले …..मोती ,
नहाकर आ गई लेकिन समंदर कर गई …..हाला |
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पिलाने और पीने का चला है दौर सदियों…… से ,
कभी मीकी कभी तुलसी कभी मीरा ने पी ..हाला |
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हुई जो शाम प्यासों का लगा जमघट तेरे दर …पर ,
हुई है रात काली फिर से तन्हा हो रही …..हाला |
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शराबी हो गया है ये तेरा आलोक बिन …….पीये ,
न तुम ने दी कभी हाला न मैंने पी कभी …हाला |

आलोक अनंत 

अनन्त आलोक

नाम - अनन्त आलोक जन्म - 28 - 10 - 1974 षिक्षा - वाणिज्य स्नातक शिक्षा स्नातक, पी.जी.डी.आए.डी., व्यवसाय - अध्यापन विधाएं - कविता, गीत, ग़़ज़ल, हाइकु बाल कविता, लेख, कहानी, निबन्ध, संस्मरण, लघुकथा, लोक - कथा, मुक्तक एवं संपादन। लेखन माध्यम - हिन्दी, हिमाचली एंव अंग्रेजी। विशेष- हि0प्र0 सिरमौर कला संगम द्वारा सम्मानित पर्वतालोक की उपाधि - विभिन्न शैक्षिक तथा सामाजिक संस्थाओं द्वारा अनेकों प्रशस्ति पत्र, सम्मान - नौणी विश्वविद्यालय द्वारा सम्मान व प्रशस्ति पत्र - दो वर्ष पत्रकारिता आकाशवाणी से रचनाएं प्रसारित - दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित - काव्य सम्मेलनों में निरंतर भागीदारी - चार दर्जन से अधिक बाल कविताएं, कहानियां विभिन्न बाल पत्रिकाओं में प्रकाशित प्रकाशन - तलाश (काव्य संग्रह) 2011 संपर्क सूत्र - साहित्यालोक, बायरी, डा0 ददाहू, त0 नाहन, जि0 सिरमौर, हि0प्र0 173022 9418740772, 9816642167

One thought on “ग़ज़ल : पिला दी हुस्न की हाला

  • विभा रानी श्रीवास्तव

    वाह्ह बहुत बढियाँ

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