कविता

“लावणी छंद”

16-14 पर यति, युग्म पंक्ति तुकांत और अंत में दो गुरु……..
कब तक होगा युद्ध तात जी, कबतक महि भारत होगा
कबतक यह द्रोपदी सभा बिच, न्याय चित कारक होगा।।
कबतक अर्जुन खामोश रहें, कबतक जिय नारक होगा
कुछ तो कहो मुरारी माधो, सुधि बुधि कब धारक होगा।।
खर दूषण मन दूषण दूषण, जल थल नभ कबतक होगा
कबतक दूषण वायु चलेगी, धरा पतन कबतक होगा।।
कबतक होगी राजनीति यह, पाक देश कबतक होगा
कबतक भुखा रहेगा बचपन, धोखा धक कबतक होगा।।
कितना हिरनी का वध होगा, किस मुकाम हवसी माया
रूप कुरूप कहाँ तक ढोंगी, कैसी होगी पड़ छाया।।
कितना भोगी होगा मानव, कैसी हो कंचन काया
अर्थ व्यर्थ काला धन दानव, दरपन में कैसी साया।।

महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

*महातम मिश्र

शीर्षक- महातम मिश्रा के मन की आवाज जन्म तारीख- नौ दिसंबर उन्नीस सौ अट्ठावन जन्म भूमी- ग्राम- भरसी, गोरखपुर, उ.प्र. हाल- अहमदाबाद में भारत सरकार में सेवारत हूँ