लघुकथा

लघुकथा : टूटती आस

तालाब, कूँये, बाबडी सब सूख चुकी थे, बचा था तो सिर्फ काला दूषित पानी जिसे पीकर सारी बस्ती बीमार हो चुकी थी।
छमिया के पिता को भी वैध ने एक घूंट दूषित पानी के लिये मना किया था वरना जान जा सकती है. छमिया भी साफ पानी के सारे जतन कर चुकी थी, चेहरे पर छाई बेबसी एक विश्वास में बदल गई और खाली घडे को लेकर चल दी सरपंच के घर, जिसने साफ पानी का एक मात्र कुएं पर कब्जा कर रखा था, पर बहां पर सरपंच की दबंगई के आगे पानी न ले सकी।
“पानी चाहिए तो कीमत अदा करनी होगी ” सरपंच क्रूर हँसी के साथ बोला।
“अरे सरपंच इतना निर्दयी मत बन, कुदरत का कहर भेदभाव नहीं करता जिस पर तू कब्जा करके बैठा है, कल बो भी सूख जायेगा, फिर तू किसके पास जायेगा “
छमिया एक घडा पानी के लिए जमीन का सौदा करने को तैयार न थी। जिस विश्वास के साथ गई थी,, निराशा के साथ बापस लौट आई,,,
पानी के लिये पिता की सांसे जा चुकी थी, छमिया के हाथ से घडा छूटकर फूट चुका था,
आज आसमान भी उसके दुख से फूट पड़ा, और झमाझम रोया, पानी के लिये कहीं जिंदगी जा चुकी थी तो कही लौट रही थी बारिश के साथ।
रजनी विलगैंया

रजनी बिलगैयाँ

शिक्षा : पोस्ट ग्रेजुएट कामर्स, गृहणी पति व्यवसायी है, तीन बेटियां एक बेटा, निवास : बीना, जिला सागर