उपन्यास अंश

आजादी भाग –११

सिपाही का झन्नाटेदार थप्पड़ विजय के लिए अप्रत्याशित ही था । उसकी आँखों के सामने तारे नाच उठे । एक हाथ से अपना गाल सहलाते हुए विजय ने सिपाही की तरफ रोष से देखते हुए उसके अगले सवाल का जवाब देने के लिए खुद को तैयार कर लिया । सिपाही ने उससे दूसरा सवाल पूछा जैसे कुछ हुआ ही न हो   ” कहाँ रहता है ? ”
विजय ने शांत स्वर में बताया ” बेघर हूँ साहब ! ये धरती मैया ही मेरा बिछौना और ये आसमान ही मेरा चद्दर है । ”
” ठीक है । ठीक है । अब ज्यादा ज्ञान न बघार अब बता कि रात के इस समय कहाँ से आ रहा है तू ? ” सिपाही ने उसे हड़काते हुए दूसरा सवाल दागा था ।
लेकिन उससे तनिक भी भयभीत न होते हुए विजय ने लापरवाही से जवाब दिया ” क्या साहब ! अभी तो बताया आपको कि मेरा कोई घर द्वार नहीं है । पीछले चौराहे पर जो बगिया है वहीँ सो गया था रात में । अभी थोड़ी देर पहले ठण्ड के मारे नींद खुल गयी और ठण्ड भगाने के लिए सड़क पर चहलकदमी कर ही रहा था कि आपने देख लिया ।”
” ठीक है ! चल यहाँ अंगूठा लगा और वहाँ जाकर बैठ जा । तुझे सुबह कोर्ट में पेश करेंगे । वहाँ से अपनी जमानत करा लेना । ” सिपाही ने उसके सामने एक रजिस्टर खोलते हुए बताया ।
” लेकिन क्यों साहब ? मैंने किया क्या है ? ” विजय ने ऐतराज जताया था ।
” आज नाकाबंदी है । रात में शहर में घूमना कानूनन जुर्म है । सही संतोषजनक जवाब नहीं देना उस गुनाह को और बढाता है । ” सिपाही ने समझाया था ।
” लेकिन साहब ! अब मुझे क्या मालूम कि ऐसा भी होता है ? मैं तो यही समझ रहा था कि मैं आजाद देश का आजाद नागरिक हूँ और मुझे भी अपने देश में कहीं भी घूमने फिरने का हक़ है  । अब ये तो मुझे आज पता चल रहा है कि अपनी मर्जी से कहीं  घूमना भी गुनाह की श्रेणी में आता है । ” विजय ने बताया था ।
” ठीक है ठीक है ! चल जल्दी से अंगूठा लगा दे यहाँ पर और वहाँ जाकर बैठ जा । अभी थोड़ी देर में ही नाकाबंदी ख़त्म होगी और तुझे थाने ले जायेंगे । ” सिपाही ने डपटते हुए ही कहा था ।
लेकिन विजय कहाँ डरने वाला था ? इन्हीं लोगों के बीच तो वह पला बढ़ा था । निर्भीकता से बोला ” अंगूठा क्यों साहब ? ईश्वर की कृपा से मैं हाई स्कूल पास हूँ। अपना हस्ताक्षर भलीभांति कर सकता हूँ और इसीलिए जानता हूँ कि ऐसा कोई कानून नहीं है । फिर भी अगर चाहते हो कि मैं तुम्हें कुछ चाय पानी दे दूँ तो मैं बिलकुल तैयार हूँ । बोलो कितना देना है ? ” कहते हुए विजय ने अपने पैंट की जेब में हाथ डाला ।
सिपाही विजय के पास आते हुए फुसफुसाया ” अरे ! तूू समझ क्यों नहीं रहा है ? ये नया साहब बहुत कड़क है । अभी कुछ मत बोल । बाद में देखता  हूँ । ”
विजय अभी कुछ और बोलता कि तभी पुलीस का वह साहब भी गाड़ी में से निकल कर उनके पास आ गया  । विजय ने दोनों हाथ से उसका अभिवादन किया । सीर हिलाकर उसके अभिवादन का जवाब देते हुए उस पुलीस अधिकारी ने सिपाही से पूछा ” क्या हुआ ? क्या बहस हो रही है ? ”
सिपाही ने उसे सलाम ठोंकते हुए जवाब दिया ” कुछ नहीं साहब ! यह रात में बिना किसी वैध कागजात के यहाँ से गुजर रहा था । पूछताछ में भी कोई सही जवाब नहीं दे पाया इसलिए इसको हिरासत में लेकर जज साहब के सामने पेश करने के लिए कागजात तैयार कर रहा था । अब आगे आप जैसा कहें । ”
अधिकारी ने सिपाही की बात सुनकर विजय की तरफ मुड़ते हुए उससे पूछा ”  तुम कहाँ रहते हो ? ”

” बेघर हूँ साहब  ! कोई फिक्स जगह नहीं है । आज पिछले चौराहे के पास जो बगीचा है न वहीँ सोया था । ठण्ड के मारे मेरी नींद उड़ गयी थी और टहलता हुआ इधर से जा रहा था कि यहाँ फंस गया । ये साहब तो कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे । ” विजय ने विनम्रता से जवाब दिया था ।
” ठीक है सोलंकी ! इसको जाने दे ।” सिपाही को निर्देश देकर अधिकारी ने विजय की तरफ देखा और उसे चेतावनी देने वाले लहजे में सुनाया ” आज तुम्हें पहली बार देख रहा हूँ । हो सकता है कि तुम सच बोल रहे हो । लेकिन आगे से ध्यान रखना रात में इस तरह फिर कभी टहलते हुए दिखे तो तुम्हारी खैर नहीं । अब तुम जा सकते हो । लेकिन कहाँ जाओगे ? ”
उसकी बात से उत्साहित विजय ने कहा ” साहब ! मैं सच ही कह रहा हूँ और आगे से  आपने जो कहा है उसका ध्यान रखूँगा । आपने मेरी बात समझी इसके लिए आपका धन्यवाद ! अब तो मैं वापस जहां सोया था वहीँ वापस जाना चाहता हूँ । चलूँ ? ”
” ठीक है ” उस अधिकारी ने जवाब दिया था ।
विजय गहरी सांस छोड़ता हुआ वहाँ से वापस पीछे की तरफ चल पड़ा जहां उसके सभी साथी सड़क के किनारे छिप कर सब कुछ देख तो रहे थे लेकिन उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था । इनकी बातचीत उन्हें सुनाई जो नहीं पड़ रही थी । ऐसा लग रहा था जैसे उसके सीर से कोई बहुत बड़ी बला टल गयी हो ।
सड़क पर चलते हुए ही विजय ने अपने साथियों को इशारा कर दिया था । सोहन ‘ रईस और रोहन सड़क के नीचे नीचे ही छिपते हुए जीस तरफ से आये थे उसी तरफ बढ़ने लगे । कुछ ही  दूर जाने के बाद विजय ने उन्हें इशारा किया और सभी सड़क पर विजय के पास आ गए । सोहन ने पहुंचते ही पूछ लिया ” आखिर हुआ क्या ? तुम वापस क्यों आ गए और वो साहब क्या बोल रहा था ? ”
विजय उनकी व्यग्रता को समझ रहा था । धीरे से मुस्काते हुए बोला ” अरे ! वो सिपाही मुझे लपेटने के चक्कर में था लेकिन मैं उसके झांसे में आनेवाला थोड़े ही हूँ। उसका भरपूर  जवाब दिया । वो तो अच्छा हुआ कि वो बड़ा साहब खुद ही उठ कर हमारे पास आ गया और मुझे आने दिया । लेकिन एक बात है ये सोलंकी साहब कुछ ज्यादा ही भाव खा रहा था । लगता है इसकी शिकायत  ‘भाई ‘ से करनी ही पड़ेगी । ”
” भाई ! कौन भाई ? हम तो तुम्हीं को भाई समझते हैं । ” सोहन ने कुतूहल से पूछ लिया था । विजय के मुंह से वह पहली बार किसीके लिए ‘ भाई ‘ का संबोधन सुन रहा था ।
विजय उनकी मनोदशा को भांपते हुए  मंद मंद मुस्कुराते हुए बोला ” हाँ ! शायद मैंने तुम लोगों को बताया नहीं है ‘ भाई’ के बारे में । असलम नाम है  ‘ भाई ‘ का । ”

 

 

 

क्रमशः

*राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।