कविता

डिजिटल रिश्ते

सोशल मीडिया पर आकर
रख जाते दिल का हाल,
पर जब कोई पूछे रिश्तों का सच,
तो चुप हो जाते तत्काल।

डिजिटल रिश्तेदार
हजारों-लाखों में मिल जाएंगे,
मगर अपने ही घर के रिश्ते
अक्सर भूखे रह जाएंगे।

मन हुआ तो स्टेटस देखा,
लाइक किया, इमोजी भेज दिया,
औपचारिकता की चादर ओढ़
स्नेह का कर्तव्य पूरा कर लिया।

लगाव कब का खत्म हो चुका,
बाकी नहीं बचा एक प्रतिशत,
भावनाएं अब फाइलों जैसी,
रिश्ते बन बैठे हैं डेटा-संचित।

घर में कोई शुभ आयोजन हो,
निमंत्रण जाए हर द्वार,
कुछ लोग बेमन से आएंगे,
निभाने भर को व्यवहार।

खाया-पीया, सलाहें दीं,
व्यवस्था पर टिप्पणी सुनाई,
फिर यह कहकर चल देंगे—
“घर में बहुत व्यस्तता भाई।”

और जो कल तक निखट्टू थे,
बदनाम थे जिनके नाम,
वही शायद सबसे ज्यादा
बताये घर में है अपना काम।

रिश्तों की ऊष्मा खोते-खोते,
संवेदनाएं भी सूख चुकी हैं,
लोग डिजिटल रिश्ते निभाते-निभाते
खुद डिजिटल बन चुके हैं।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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