कविता
सर्वत्र मौन की दशा
किसी की विजय नहीं
सामूहिक कायरता का चिन्ह है।
मौन और एकांत के बीच
बिलखता है कोई सपना
जीने को जीवन लेकिन
नहीं पनप पाता उसका जीवन
सीधे जनतंत्र पर
करारा हमला है यह
लाभ लोभ के दोहरे तनाव के बीच
अपना विरोध दर्ज करा रहा जन
बोल पड़ता है कभी मुखर आवाज में।
गांधी हट गये नरेगा से
जल्दी ही हटेंगे नोटों से
क्या मुद्रा शास्त्र का चलन है यह
गांधी के देश में गांधी का अपमान
समझो मर गया आंख का पानी
ऐसे में आखिर
सत्ता के चतुर चालाक शातिरों से
लड़ना आसान नहीं होगा
निहत्थे लोगों
तुम कैसे करोगे
शब्द और संस्कृति का परिवर्तन।
बदलने को चीजें
लड़ना होगा, खोना होगा
बहुत कुछ इस समय में।
झांकना होगा
अपने भीतर भी
कहां कितना है
इस दुनिया का वजूद।
— वाई. वेद प्रकाश
