ग़ज़ल
सुविधा की डोरी पर लटके हमने रिश्ते देखे हैं
सम्बंधों की धूप में हमने लोग झुलसते देखे हैं
भाई-बहिन माँ-बाप सभी इस घेरे में आते हैं पर
लक्ष्मण रेखा से बाहर कुछ पाँव निकलते देखे हैं
रिश्ते चुभते हैं चुभने दो बिल्कुल मत प्रतिरोध करो
आग में चाहत की मैंने कुछ फूल महकते देखे हैं
दोषी केवल व्यक्ति नहीं अपराधी वक्त भी होता है
अपनी ही किस्मत से हमने लोग झगड़ते देखे हैं
शिकवा-गिला कभी न करना, आँसू व्यर्थ बहाना मत
सच की आँख में झूठे दरपन ‘शान्त’ चटखते देखे हैं
— देवकी नन्दन ‘शान्त’
