प्यार और मुक्ति
मैं हमेशा निर्बंध रहने का आदि था । मुक्त उड़ान ही मेरी फितरत रही, तुमसे मिलने के बाद प्यार की ज़ंजीरों में बंध जाने का डर जो था मुझे… ।तुमने उसी प्यार से मेरे मन की लघुता की ज़ंजीरें तोड़ दी और दे दिया खुला आकाश !
मैं हमेशा भावनाओं के ज्वार में बह जाता । न चाहकर भी खिंचा चला जाता । मेरी भावुकता ही मेरी कमजोरी थी । मगर तुमसे मिलने के बाद मुझे चाहत और भावनाओं का फर्क नज़र आने लगा है । ज़िंदगी की खुली हवा का स्पर्श, मेरे अंदर नया जोश भर देने लगा है ।
तुम्हारा साथ होना ही मुक्ति का अनुभव रहा मेरे लिए… !
