कविता

ये नीर नहीं है, आंसू हैं

ये नीर नहीं है, आंसू हैं,
जो इन आंखों से बहते हैं,
क्या वही पुराने लोग हैं जो,
सदियों से देश में रहते हैं.
वो कहां गई ममता-माया?
जो इक पहचान हमारी थी,
क्या दया-धर्म का मान घटा?
जिसने संस्कृति संवारी थी.
आजाद हुए यह बात सही,
पर बची गुलामी की कड़ियां,
सोचा था सुमन हंसाएंगे,
पाईं विस्फोटों की लड़ियां.
क्या यही हमारी परम्परा?
क्यों दुःख पलनों में पलते हैं?
है यही हमारी व्यथा-कथा,
आंसू नयनों के कहते हैं.
अब ली करवट है भारत ने
और तनिक सजगता आई है,
शायद कुछ कर दिखलाने की,
कसमें अब सबने खाई हैं.
है एक बार आशा जागी,
शायद यह देश संभल जाए,
जो मूल्य हमारे कुम्हलाए,
वे पुनः सुमन-सम खिल पाएं.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244