सामाजिक

ध्रूमपान

ध्रूमपान करने वाले कर्मचारियों को हतोत्साहित करने के लिए जापान की एक कम्पनी ने ध्रूमपान न करने वाले कर्मचारियों को छह दिन की अतिरिक्त छुट्टी देने की अनोखी पहल शुरू की है। जिसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। जिस युवा पर राजनीति नाज करती है, वह भी नशे के चपेट में है, लेकिन राजस्व की फ़िक्रमंद सरकारें आँखें मूंदकर चल रहीं हैं। क्या सरकार की यहीं सामाजिक सरोकार की जिम्मेवारियाँ हैं? देश में प्रति चार मिनट में अगर एक व्यक्ति काल के गाल में समा रहें हैं। तो सरकार को भी अपनी नैतिक जिम्मेवारियों समझना चाहिए। एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर 2040 तक तंबाकू उत्पादों पर रोक नहीं लगी, तो सदी के 1 अरब लोग मौत के घाट पहुंच जाएंगे। चिकित्सा तंत्र के विशेषज्ञों के मुताबिक ध्रूमपान और तंबाकू अकाल मौत का दूसरा तो बीमारियां उत्पन्न करने का चौथा बड़ा कारक है। डब्ल्यू एच ओ के मुताबिक भारत में करीब 25 करोड़ लोग गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, हुक्का के जरिए तंबाकू का सेवन करते है। इसके कारण 114 औसतन घंटे और 24 घंटे में 2800 लोग तंबाकू उत्पाद से उत्पन्न कैंसर से दम तोड़ते है। जो 29 तरह के कैंसर पैदा करते है। सिर्फ 18 फीसद को मध्यप्रदेश सूबे में पता है, कि ध्रूमपान को लेकर कोई कानून भी है। फिर ऐसे में कैसे समझे कि सरकार लोगों को तंबाकू जैसे उत्पादों की हानियों से अवगत करा पाई है। जब हर दिन 300 से ज्यादा बच्चे केवल मध्यप्रदेश में तंबाकू खाना शुरू करते है। फ़िर हमारा देश किस स्थिति की ओर जा रहा है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। ऐसे में जब फ़िनलैंड ने सार्वजनिक स्थानों पर ध्रूमपान करने से रोक लगाने के बाद अब घर की बालकनी में सिगरेट पीने पर रोक लगाने की दिशा में बढ़ चुका है। इसके अलावा भूटान ने भी 2005 में ध्रूमपान पर रोक का ऐलान कर चुका है। ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 2011 में देश की जीडीपी 1.6 फ़ीसद हिस्सा तंबाकू जनित रोगों के उपचार पर ख़र्च करने वाले देश को भी ध्रूमपान से बचने के लिए सख़्त कदम उठाने चाहिए।            

महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896