कविता

तुम्हारे साथ जीकर देख ली

तुम्हारे साथ जी कर देखी ली
तुम्हारे साथ लम्हे गुजार कर देख ली
तुम्हारे साथ भी होकर देख ली
तुम्हारा साथ देकर भी देख ली
तुम्हारे हर अहसास को समझ ली
तुम्हारे जज्बात को पकड़ ली
अब बचा ही क्या तुम्हारे पास
मुझे समझाने के लिये
दिखाने के लिये, बिताने के लिये
बताने के लिये, सुनाने के लिये
बहकती चली गयी थी मैं
तुम्हारे प्यार में
बह गयी थी मैं तुम्हारे जज्बात में
खुद को भूल गयी थी
तुम्हारी बॉहो में
सब कुछ समझ बैठी थी तुम्हे
तुमपर न्यौछावर कर दी थी अपने आप को
क्योकि मे़ैं मूर्ख नही, तुमसे प्यार की थी
और तुम इसी का फायदा उठायें
प्यार का झुठा ढोंग बनायें
फिर क्या चल दियें अपने रास्ते
मुझसे मूँख मोड़ कर
बीच रास्ते में मुझे अकेला छोड़कर
सही कहा है इस मतलबी दुनियॉ मे
न प्यार रहा न कोई रिश्ता रहा
सब मतलब के यार यहॉ
न ही किसी का साथ यहॉ।
निवेदिता चतुर्वेदी ‘निव्या’

निवेदिता चतुर्वेदी

बी.एसी. शौक ---- लेखन पता --चेनारी ,सासाराम ,रोहतास ,बिहार , ८२११०४

One thought on “तुम्हारे साथ जीकर देख ली

  • कालीपद प्रसाद

    दिल से निकले हुए शब्द – सुन्दर

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