लघुकथा

कल्पना के पंख

नासा द्वारा खींचे गए “पिलर्स ऑफ़ क्रियेशन” अर्थात् “सृष्टि के स्तम्भ” नामक अति-प्रसिद्ध चित्र को देखकर दर्शाई गई ”चील निहारिका” के विश्लेषण से मैंने निष्कर्ष निकाला था- ”निहारिकाओं में अक्सर तारे और ग्रहीय मण्डल जन्म लेते हैं,”
मेरी इस दृष्टि को किसी ने दूरदृष्टि कहा, किसी ने दिव्य दृष्टि, नासा ने इसे अद्भुत उपलब्धि का नाम दिया था और मुझे अपनी इस दृष्टि को और विस्तृत करने के लिए हर संभव सहायता देने की पेशकश भी की थी. मेरी जिम्मेदारी और अधिक बढ़ गई थी.
खुशी की इस वेला ने मुझे अतीत के गलियारों में पहुंचा दिया था.
”मेरा नाम आपने निहारिका क्यों रख दिया पापा?” थोड़ा बड़े होने पर मैंने यों ही उत्सुकतावश पापा से पूछा था.
”तुम्हारे दादा जी की अनुभवी आंखों के कारण. जब तुम्हारा जन्म हुआ था, तो तुम्हारे दादा जी ने तुम्हें देखते ही तुम्हें निहारिका के संबोधन से संबोधित किया था. जब मैंने इसका कारण पूछा, तो बोले थे- ‘चारों तरफ निहार रही थी, मानो अभी से अपनी राह निर्धारित करना चाह रही हो.”
”सच में पापा?”
”हां, सच में. जब तुम्हें अस्पताल से घर लाए थे, तो तुमने कमरे की छत को ऐसे निहारा था, मानो आकाशगंगा से परे की किसी गैलेक्सी को निहार रही हो.”
फिर मुझे याद आया वह समय जब मैं जिंदगी के उस चौराहे पर खड़ी थी, जहां सबको अपनी-अपनी राह निर्धारित करनी होती है. साहित्य में मेरी रुचि थी, 2-3 भाषाओं पर मेरा आधिपत्य था, पर मैं कुछ नया करना चाहती थी, जो यूनीक तो हो ही, चुनौतीपूर्ण भी हो, सो मैंने विज्ञान की राह चुनी थी. स्नातक कक्षा तक तक पहुंचते-पहुंचते ही मौसी ने ऑस्ट्रेलिया में पढ़ने का न्योता भेज दिया. ऑस्ट्रेलिया में ढेरों विकल्प थे, मैंने रोबोटिक्स का विकल्प चुना, इसी में स्नातक, परा स्नातक, शोध करके नासा पहुंच गई थी. अब मुझे रोबोटिक्स और गैलेक्सी की भाषा का भी ज्ञान हो गया था. वहां मुझसे मेरे नाम ‘निहारिका’ का मतलब पूछा गया, मैंने बताया ‘नेब्युला’. गैलेक्सी और नेब्युला के क्षेत्र में मैं नित नए सिद्धांतों का प्रतिपादन करती रही.
नासा की सहायता के हाथ मेरी कल्पना के पंख बन गए थे. मुझे अपने अंदर तारे और ग्रहीय मण्डल जन्म लेते दिखाई देने लगे थे.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

2 thoughts on “कल्पना के पंख

  • लीला तिवानी

    निहारिका या नेब्युला (English: Nebula) अंतरतारकीय माध्यम (इन्टरस्टॅलर स्पेस) में स्थित ऐसे अंतरतारकीय बादल को कहते हैं जिसमें धूल, हाइड्रोजन गैस, हीलियम गैस और अन्य आयनीकृत (आयोनाइज़्ड) प्लाज़्मा गैसे उपस्थित हों। पुराने जमाने में “निहारिका” खगोल में दिखने वाली किसी भी विस्तृत वस्तु को कहते थे। आकाशगंगा (हमारी गैलेक्सी) से परे कि किसी भी गैलेक्सी को नीहारिका ही कहा जाता था। बाद में जब एडविन हबल के अनुसन्धान से यह ज्ञात हुआ कि यह गैलेक्सियाँ हैं, तो नाम बदल दिए गए। उदाहरण के लिए एंड्रोमेडा गैलेक्सी ( देवयानी मन्दाकिनी ) को पहले एण्ड्रोमेडा नॅब्युला के नाम से जाना जाता था। नीहारिकाओं में अक्सर तारे और ग्रहीय मण्डल जन्म लेते हैं, जैसे कि चील नीहारिका में देखा गया है। यह नीहारिका नासा द्वारा खींचे गए “पिलर्स ऑफ़ क्रियेशन” अर्थात् “सृष्टि के स्तम्भ” नामक अति-प्रसिद्ध चित्र में दर्शाई गई है। इन क्षेत्रों में गैस, धूल और अन्य सामग्री की संरचनाएं परस्पर “एक साथ जुड़कर” बड़े ढेरों की रचना करती हैं, जो अन्य पदार्थों को आकर्षित करता है एवं क्रमशः सितारों का गठन करने योग्य पर्याप्त बड़ा आकार ले लेता हैं। माना जाता है कि शेष सामग्री ग्रहों एवं ग्रह प्रणाली की अन्य वस्तुओं का गठन करती है।

  • लीला तिवानी

    किसी में प्रतिभा हो और उस पर परिवारीजन और नासा जैसी किसी कल्पनाशील संस्था का सहयोग-साथ मिल जाए, तो कल्पना के पंख लगने में तनिक भी संशय नहीं रहता. ऐसा ही निहारिका के साथ भी हुआ था.

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