गीतिका/ग़ज़ल

प्रभात नई

झिलमिल झिलमिल तारें डूबे धरा हुई प्रभात नई
दूर क्षितिज अरुणाई फैली लगती जैसे बात नई
होने लगा प्रभास रह रह कल-कल स्वर में नदी रही बह
बँधी नाव नाविक ने खोली जल-तरंग सुहात नई ।
पूरव-दिशा सूरज का गोला निकला जैसे रत्न अमोला
पंछी त्याग चले नीड़ों को  जाती लगे जमात नई ।
नव-प्रभात नव-शक्ति देता  कर्म  जताता भक्ति देता
बैठ किनारे समाधिस्थ वक करता हर पल घात नई ।
—  व्यग्र पाण्डे 

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र' कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी,स.मा. (राज.)322201