नया वर्ष हो बहुत मुबारक
तारीखों का, खेल अनूठा,
शुरू जनवरी, खत्म दिसम्बर ।
कल जैसा था,
वैसा ही है ,
हंसता, गाता,
भरा समन्दर ।।
क्या बदला है,
परिवेश में ,
गतिमान सब,
स्वदेश में ।
हां, आयु का ,
घोड़ा पल-पल,
श्वेत हुआ है ,
श्याम केश में ।।
रोज नया है ,
कहां पुराना ,
पल-पल खिलता,
देखो अम्बर ।
कब देखा है ,
हम लोगों ने ,
रंग-मिजाजी ,
इन फूलों को ।
भूल गए है ,
तारीखों में ,
अल्हड़ मस्ती,
के झूलों को ।।
अमन नया सब,
अपने भीतर ,
पर बेगाने ,
अपने ही घर ।
नई बात का,
नया बहाना ,
आप सभी को ,
बहुत मुबारक ।
मुठ्ठी रखना ,
नया-पुराना ,
नया वर्ष हो,
बहुत मुबारक ।।
नया वर्ष है,
नई बात हो ,
चलना सीखें ,
हम सब मिलकर ।
तारीखों का, खेल अनूठा,
शुरू जनवरी, खत्म दिसम्बर ।।
— मुकेश बोहरा अमन
