गीतिका/ग़ज़लपद्य साहित्य

आफताब जले…

 

आसमानों में दिन चढ़े ज्यूँ आफताब जले।
जलने वाले कुछ इस कदर बेहिसाब जले।।

वतन की इस तरह तकदीरें जला करती हैं।
जले मकतब अगर जो हाथ की किताब जले।।

बखूबी सीख लिया है लेने देने का हुनर।
तेरे सवाल जले और मेरे जवाब जले।।

बस्तियों में जो इतनी रोशनी सी फैली है।
फ़क़त घर ही नहीं ताउम्र देखे ख्वाब जले।।

नए हैं तौर तरीके क्या इन से घबराना।
शरम तो पहले जल चुकी अब हिजाब जले।।

*डॉ. मीनाक्षी शर्मा

सहायक अध्यापिका जन्म तिथि- 11/07/1975 साहिबाबाद ग़ाज़ियाबाद फोन नं -9716006178 विधा- कविता,गीत, ग़ज़लें, बाल कथा, लघुकथा