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सब कुछ पीछे छूट गए

जल, जीवन, हरियाली, नशामुक्ति, बाल-विवाह समाप्ति और दहेज उन्मूलन हेतु 19 जनवरी 2020 को बिहार में संपन्न हुई “मानव शृंखला” में Longest Selfie with Human Chain का कीर्तिमान बनानेवाले ब्लॉगर और लेखक टी. मनु, भारत के सबसे कम उम्र में पद्मभूषण और पद्म विभूषण के लिए नामांकित व्यक्ति हैं, India Book of Records ने एतदर्थ सम्मानित किया है, तो उसे कई सामाजिक अभियान में National Record प्राप्त है, यथा- कम समय में सर्वाधिक तिरंगा-रिबन सर्वाधिक लोगों को बांधने हेतु Limca Book of Records ने सम्मानित किया है। ग्रेट ब्रिटेन की Records Holder Republic में उनके कई World Records शामिल हैं।

‘सब कुछ पीछे छूट गए’ नामक शीर्षक कविता में उनके संदेश सामयिक और बेहद महत्वपूर्ण है, यथा-

इंजीनियर बनते-बनते जिम्मेदार हम बन गये,
और एक दिन आखिर सबकुछ पीछे छूट गए ।

हाँ, सब कुछ पीछे छूट गए, अभियंता बनते-बनते,
जिम्मेदार कब हम बन गये, मालूम भी नहीं चला ।

जब भी याद आती है, इंजीनियरिंग कॉलेज के वो चार साल,
मन सुपरसोनिक से भी अरबों गुने रफ्तार में निकल जाते !

उन जो भूली-बिसरी यादें बन, उन लम्हों की खोज में,
कभी हमें गुदगुदाती है, तो कभी हमें  रुलाती है ।

कितने किये थे मेहनत, उस जुनून को पाने के लिए !
कितने ही किये थे इंतजार, उन दोस्तों से मिलने के लिए !

जिन्हें जानते भी नहीं थे, न जानने का प्रयास किए थे ,
साल दर साल खत्म होते-होते वो भी बिछुड़न दे गए ।

अजीब थी वह दुनिया, कोई सुबह, कोई दोपहर जगते थे,
बाथरूम-वाशरूम जाने के लिए, हमेशा ही झगड़ते थे ।

12वीं में जब थे, मेहनतकश-मजदूरी ही था एकमात्र रास्ता,
इंजीनियरिंग कॉलेज आने का और अच्छी नौकरी पाने का ।

पर पता न चला हम सबको कि कब चार साल गुजर गए,
हम इतने बड़े कब होंगे, छुटकन से बड़कन बोल गए ।

लेकिन उन सालों में अजीब संस्कार हमें मिले,
किसी के पैंट उतारने का, गिरेहबान में झांकने का ।

ये हँसी-मजाक था, क्लास बंक कर हम कर लिया करते थे,
तब कॉमनरूम में फिल्में कम ही चला करते थे ।

अजीब हालात थे, खाने के लिए हम मेस में लड़ा करते थे,
खाना मिल जाने पर, डस्टबिन में फेंका करते थे ।

क्लास की क्या  ? जब सिर्फ घंटी बजा करती थी,
राम-रहीम याद आते थेपर कभी इन्सां न मिले, न हनी ।

प्रोजेक्ट के नाम पर, बस पन्नों को हम भरा करते थे,
एग्जाम की सुबह उसे micro कर लिया करते थे ।

यह अपना कॉलेज था, यहां सब माफ था ,
अन्ना की अनशन को भी पार्टी में हम बदल दिया करते थे ।

कोई घास हमें नहीं देती थी, वैसे भी भला कोई क्यों दे घास,
क्योंकि घास के नाम पर , यहां बस जंगल ही होते थे ।

रिजल्ट आते ही, लालजी की थाली सजती थी
पर अंकों पर चर्चा, गदहे ही किया करते थे ।

लालजी नाम आते ही, उनके परिवार याद आते हैं,
खाना में हमें जो,  प्रेम के गूढ़ अर्थ समझाते थे ।

Snapdeal का डिब्बा, न कभी हम भूला करते हैं,
ब्रूनी का ताजमहल, वो उसमें ही सजा करते थे ।

मुमताज तो उन्हें नहीं मिली, ताज भी न जा सके,
पर हमारी खुशियों में, वो खुश रहा करते थे ।

याद आते है वो लम्हें अब, बीत जाने के बाद,
सिर्फ साथ रहते हैं, फेसबुक व what’s app के साथ।

डॉ. सदानंद पॉल

एम.ए. (त्रय), नेट उत्तीर्ण (यूजीसी), जे.आर.एफ. (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार), विद्यावाचस्पति (विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ, भागलपुर), अमेरिकन मैथमेटिकल सोसाइटी के प्रशंसित पत्र प्राप्तकर्त्ता. गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, RHR-UK, तेलुगु बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, बिहार बुक ऑफ रिकॉर्ड्स इत्यादि में वर्ल्ड/नेशनल 300+ रिकॉर्ड्स दर्ज. राष्ट्रपति के प्रसंगश: 'नेशनल अवार्ड' प्राप्तकर्त्ता. पुस्तक- गणित डायरी, पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद, लव इन डार्विन सहित 12,000+ रचनाएँ और संपादक के नाम पत्र प्रकाशित. गणित पहेली- सदानंदकु सुडोकु, अटकू, KP10, अभाज्य संख्याओं के सटीक सूत्र इत्यादि के अन्वेषक, भारत के सबसे युवा समाचार पत्र संपादक. 500+ सरकारी स्तर की परीक्षाओं में अर्हताधारक, पद्म अवार्ड के लिए सर्वाधिक बार नामांकित. कई जनजागरूकता मुहिम में भागीदारी.