कहानी

बातुक वचन मास्क जरूरी

एक था बातुक! उसे दोस्ती थी मिहनती से। वह जब कहीं जाता? मेहनती को अपने साथ ले जाता।
एक दिन वे दोनोंजा रहे थे। धने जंगल सून-सानविरान राहों पर!
मेहनती को आरामदायक मिल गया। मेहनती ने पूछा? बातुक से? मैं मेहनती हूँ और ये आरामदायक मुझे काम करने पड़ते
जबकि ये आराम करता है। ऐसा क्यों है?
बातुक  बोला! यह तुम्हारा कर्म है और तुम उसे करते हो। यह उसका भी कर्म  है लेकिन वह नही करता। इसकी दंण्ड उसे अवश्य मिलेगी? मेहनती बोला!  कौन देगा? खुद प्रकृति देगी। क्योंकि यह प्रकृति कर्मवीरो की है।
कैसे?
यह समय आने पर पता चलेगा।
मेहनती बोला!  कब आएगा वह समय?
कभी भी आ सकता है?
जंगल में एक दुर्गंध फैल रही थी जो किसी विषैले गैस की भांति असर कर रही थी। मेहनती ने तुरंत पत्तो के तीन मास्क बनाये।
एक अपने पहन ली,  दूसरा बातुक को दिया,  बातुक ने भी पहन ली,  तीसरा आरामदायक को दिया लेकिन आरामदायक ने नही पहनी?  उसने सोचा यह थोड़ी देर मे खुद समाप्त हो जाएगा? कुछ समय पश्चात आरामदायक को सांस लेने में तकलीफ होने लगी थी, और वह जहरीली गैस उसके शरीर में  फैल चुका था वह छटपटाने लगा फिर मिहनती ने उसे मास्क पहनाया और वैद्य के पास ले गया जहाँ उसका इलाज चल रहा है।लेकिन आरामदायक की जीवन शैली भी उस घटना के बाद बदल चुकी है अब वह सबकी सुनता है और बात भी मानता है।
आप भी मिहनती की तरह बने!  मास्क का प्रयोग करे। जहरीली गैस और संक्रमम से बचें। सरकार के द्वारा जारी नियमों का पालन करें। आरामदायक कतई न बनें?
— आशुतोष

आशुतोष झा

पटना बिहार M- 9852842667 (wtsap)