भाषा-साहित्यलेख

दो हिंदी उपन्यासों ‘सूअरदान’ और ‘गोदान’ में स्पृहणीय अंतर

हिंदी लेखक रूपनारायण सोनकर की स्वानुभूति (भटकटैया, हंस, नवम्बर 2019) है, जिनमें उनके द्वारा रचित वैज्ञानिकी फ़िक्शन ‘सूअरदान’ से चुराई और उड़ाई गई कथा और कथा-विन्यास से श्री राकेश रोशन ने किसप्रकार हिंदी फिल्म ‘कृष-3’ बना ली, फिर जिसप्रकार से सोनकर जी ‘सूअरदान’ के कॉपीराइट उल्लंघन के विरुद्ध लड़े तथा तब उनके लिए भारतीय न्यायिक व्यवस्था एक दलित साहित्यकार के लिए जटिलतम होती चली गई, यह तो उस समय उन्हें उतनी पीड़ा नहीं दे पाई थी, जब ‘सूअरदान’ शीर्षक पर ही ‘गोदान’ प्रशंसकों ने हल्लाबोल दिए थे. अंततः, सोनकर जी की जीत हुई, किन्तु उन्हें भारत के प्रधान न्यायाधीश के विरुद्ध अमर्यादित टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी, अगर उसे सम्मान में क्षति हुई थी, तो इस हेतु ‘मानवाधिकार आयोग’ में जाते !

वैसे कुछ वर्ष पहले ‘हंस’ में प्रकाशित मेरे आलेख ‘मेहतरानी बहन और चमारिन प्रेमिका’ की कुछ पंक्ति ‘सूअरदान’ में प्रकाशित है, बिना साभार के कारण यह भी चौर्य कृत्य है । ध्यातव्य है, मेरी नाट्यकृति ‘लव इन डार्विन’ की रचनाधारित ही हिंदी फ़िल्म ‘भूतनाथ रिटर्न्स’ बनी है! इस फ़िल्म को बनाने के लिए भी निर्माता-निर्देशक ने ‘कृष-3’ की भाँति ही चौर्य कृत्य किये!

वहीं ‘गोदान’ सिर्फ होरी की कहानी नहीं है । अगर ग्रामीण पृष्ठछेदन की जाय, तो यह गोबर कहानी है, सिर्फ धनिया नहीं, झुनिया की भी कहानी है । सिर्फ दातादीन या मातादीन की कहानी नहीं है, सिलिया और दातादीन के उठंगे स्वभाव की भी कहानी है । शहरी पृष्ठछेदन में रायबहादुर के जनहित से संबंधित कहानी है, तो मालती और मेहता की भी कहानी है।

गोबर-झुनिया के प्रणय-संबंध, मातादीन-सिलिया के प्रणय-संबंध मेहता-मालती के प्रणय-संबंध से कम थोड़े ही है । होरी की जो जीवन भर मेहनत करता है, अनेक कष्ट सहता है, केवल इसलिए कि उसकी मर्यादा की रक्षा हो सके और इसीलिए वह दूसरों को प्रसन्न रखने का प्रयास भी करता है, किंतु उसे इसका फल नहीं मिलता और अंत में मजबूर होना पड़ता है, फिर भी अपनी मर्यादा नहीं बचा पाता। वह जप-तप के अपने जीवन को ही होम कर देता है। होरी मरते भी हैं, तो अपनी गाय नहीं रहती है, जो गोदान कर पाए ! यह सिर्फ होरी की कहानी नहीं, उस समय के हर पात्र-प्रतिनिधियों की आत्मकथा है ‘गोदान’ ! लेखक  प्रेमचंद की कलम की यही विशेषता है।

‘गोदान’ संस्कृति लिए है, तो सूअरदान वैज्ञानिक उपन्यास है । दोनों की भाषा हिंदी है । दोनों की कहानी में 80-90 वर्ष का अंतर है । दोनों उपन्यासों के लिए पाठकों को उनकी अपनी नजरिया ही चयनार्थ बेहतर साबित हो सकते हैं!

डॉ. सदानंद पॉल

एम.ए. (त्रय), नेट उत्तीर्ण (यूजीसी), जे.आर.एफ. (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार), विद्यावाचस्पति (विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ, भागलपुर), अमेरिकन मैथमेटिकल सोसाइटी के प्रशंसित पत्र प्राप्तकर्त्ता. गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, RHR-UK, तेलुगु बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, बिहार बुक ऑफ रिकॉर्ड्स इत्यादि में वर्ल्ड/नेशनल 300+ रिकॉर्ड्स दर्ज. राष्ट्रपति के प्रसंगश: 'नेशनल अवार्ड' प्राप्तकर्त्ता. पुस्तक- गणित डायरी, पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद, लव इन डार्विन सहित 12,000+ रचनाएँ और संपादक के नाम पत्र प्रकाशित. गणित पहेली- सदानंदकु सुडोकु, अटकू, KP10, अभाज्य संख्याओं के सटीक सूत्र इत्यादि के अन्वेषक, भारत के सबसे युवा समाचार पत्र संपादक. 500+ सरकारी स्तर की परीक्षाओं में अर्हताधारक, पद्म अवार्ड के लिए सर्वाधिक बार नामांकित. कई जनजागरूकता मुहिम में भागीदारी.