सामाजिक

आर्यसमाज को सशक्त बनाने वाले डा. सोमदेव शास्त्री के कुछ प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय कार्य

ओ३म्

डा. सोमदेव शास्त्री, मुम्बई आर्यसमाज के प्रमुख एवं शीर्ष विद्वानों में हैं। आपने वैदिक आर्ष प्रणाली से विद्याध्ययन किया है। आप एक प्रभावशाली वक्ता हैं। आपका व्यक्तित्व आकर्षक एवं प्रभावशाली है। आपकी व्याख्यान शैली में पाठकों को आकर्षित करने तथा उन्हें विषय से बांधे रखने की क्षमता है। आप देश भर में आयोजित किये जाने वाले वेद पारायण यज्ञों के ब्रह्मा बनाये जाते हैं। आपने अपने जीवन में लगभग एक सौ वेद पारायण किये व कराये होंगे। आप स्वयं भी अपने जन्म ग्राम ननोरा, जिला मन्दसौर, मध्यप्रदेश में प्रत्येक वर्ष किसी एक वेद का पारायण यज्ञ कराते हैं। इस आयोजन में आप आर्यसमाज के विद्वानों तथा भजनोपदेशकों को आमंत्रित करते हैं। आपका ननोरा गांव वैदिक धर्म व आर्यसमाज के रंग में रंगा हुआ है। आर्यसमाज में हमने ऐसा विद्वान नहीं देखा जो अपने जन्म स्थान पर प्रत्येक वर्ष ऐसे व्यय साध्य वृहद आयोजनों को करता हो और जिसका अपने ग्रामवासियों पर प्रभाव हो। आपने अपने गांव के अधिकांश लोगों को आर्यसमाज की विचारधारा का अनुयायी भी बनाया है। आपने अपने जीवन में 36 ग्रन्थों की रचना की है। जब कभी आर्यसमाज की वेदी से कोई वैदिक धर्म की मान्यता व परम्परा के विरुद्ध कार्य किया गया, तो आपने उसका पुरजोर विरोध किया है। इसके लिये आपको प्रताड़ना का शिकार भी होना पड़ा। आप सत्यार्थप्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पर आयोजित होने वाली कार्यशालाओं में मुख्य वक्ता व प्रशिक्षक होते हैं। हमने गुरुकुल पौंधा-देहरादून में दो-तीन बार इन कार्यशालाओं में भाग लिया है और इससे हमें लाभ मिला है। आपका सत्यार्थप्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका विषयक ज्ञान काफी गहन एवं विस्तृत है। स्वाध्यायशील एवं आर्यसमाज के विद्वान भी आपके व्याख्यानों से लाभान्वित होते हैं। स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती आपके सहयोगी विद्वान एवं मित्र दोनों हैं। आप दोनों स्वामी ओमानन्द जी के शिष्य रहे हैं। ऐसे आदरणीय एवं ऋषिभक्त विद्वान डा. सोमदेव शास्त्री जी सब आर्यजनों के अभिनन्दन के पात्र हैं। आर्यसमाज का सौभाग्य है कि आर्यसमाज के पास ऐसे समर्पित एवं सजग विद्वान हैं जो आर्यसमाज के ऋषि दयानन्द के मार्ग पर चला और बढ़ा रहे हैं। डा. सोमदेव शास्त्री जी ने आर्यसमाज की विचारधारा के प्रचारार्थ कई बार विदेश यात्रायें भी की हैं। आपका परिवार वैदिक धर्म एवं ऋषि दयानन्द जी के वेदमार्ग का अनुयायी है। आपकी धर्मपत्नी बहिन श्रीमती सुदक्षिणा शास्त्री जी हैं। आपके दो पुत्र प्रणव तथा अनिरुद्ध हैं। दिनांक 6 दिसम्बर, 1950 आपकी जन्म तिथि है। आपका जीवन त्याग व तप का एक आदर्श उदाहरण है। वेदपारायण यज्ञों एवं प्रचार कार्यों से आप जो दक्षिणा प्राप्त करते हैं उस समस्त धन को आप वेद पारायण यज्ञ एवं लोकोपकार में व्यय करते हैं। आपने अपने जीवन में अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये हैं। कुछ कार्यों का परिचय हम इस लेख में दे रहे हैं।

आर्य पुरोहित सभा की स्थापना

जब आप आर्यसमाज, सान्ताक्रूज-मुम्बई के प्रधान थे तो आपने देखा कि सब लोगों के अपने संगठन होते हैं परन्तु आर्यसमाज के पुरोहितों का कोई संगठन नहीं था। पुरोहित हर परिस्थिति व सुख-दुःख में एक-दूसरे का साथ दे सकें, एक परिवार की तरह आपस के सुख-दुःख बांट सकें, इसके लिए आपने मुम्बई में एक आर्य पुरोहित सभा बनाई। मुम्बई के सभी पुरोहितों को इस सभा का सदस्य बनाया। उस सभा के प्रधान, मंत्री व कोषाध्यक्ष भी बनाये। इस सभा को चलाने के लिये डा. सोमदेव शास्त्री जी ने अपनी ओर से एक लाख रुपये की सहयोग राशि दी थी।

राष्ट्रीय आर्य भजनोपदेशक परिषद की स्थापना 

पुरोहितों की तरह ही आर्यसमाज में भजनोपदेशकों का भी अपना कोई संगठन नहीं था। सन् 2008 में आपने मुम्बई में आर्य भजनोपदेशकों की एक बैठक आयोजित की। पश्चात उनका एक भजनोपदेशक सम्मेलन आयोजित किया। आपने सन् 2008 में ही ‘‘आर्य भजनोपदेशक परिषद” के नाम से इस नये संगठन की स्थापना की। पं. वेगराज आर्य जी को इस परिषद का अध्यक्ष बनाया गया था। मंत्री श्री पं. नरेशदत्त आर्य जी, बिजनौर बनाये गये थे। देहरादून के पं. सत्यपाल सरल जी को परिषद का कोषाध्यक्ष बनाया गया था। भारत के सभी भजनोपदेशकों को इस परिषद से जोड़ने का यह प्रथम प्रयास किया गया। इसके लिये एक कोष भी बनाया गया जिससे कि यदि कभी किसी भजनोपदेशक की आर्थिक सहायता की आवश्यकता पड़े तो उसका सहयोग किया जा सके। आरम्भ में इस कोष के लिये आपने अपनी ओर से एक लाख रुपये की सहायता की। इसका परिणाम यह है कि आज आर्य भजनोपदेशक परिषद अच्छा काम कर रही है। सब एक दूसरे का सहयोग करते हैं। संगठन मजबूत बना हुआ है। देश विदेश में इस परिषद की एक पहचान बन गई है।

वैदिक मिशन, मुम्बई की स्थापना

आपने मुम्बई के अपने कुछ साथियों के सहयोग से मुम्बई सन् 2006 मेंएक एक संस्था ‘‘वैदिक मिशन” की स्थापना भी की। इस मिशन का उद्देश्य आर्यसमाज के विद्वानों को वेद सम्मेलन आयोजित कर अपने रिसर्च पेपर प्रस्तुत करने के अवसर प्रदान करने के साथ वेद विषयक शंका समाधान एवं अन्यान्य विषयों पर चर्चा करना-कराना है। आप वैदिक मिशन के नाम से मुम्बई में प्रत्येक वर्ष सम्मेलन आयोजित करते रहते हैं। वैदिक मिशन अपने स्थापना काल से प्रत्येक वर्ष सम्मेलन आयोजित कर रहा है। इन सम्मेलनों में गोष्ठियां भी आयोजित की जाती हैं। निष्पक्षता बनाये रखने के लिए इन आयोजनों में आर्यसमाज की दोनों सार्वदेशिक सभाओं के प्रधानों को आमंत्रित किया जाता है। सभाओं की लड़ाई सभाओं की अपनी है ऐसा आप मानते हैं। वैदिक मिशन यह दिखाने की कोशिश करता है कि वेद के नाम समस्त आर्यसमाज एक है।

शास्त्रज्ञ पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी स्मृति में प्रतिवर्ष व्याकरण पढ़ाने वाले एक आचार्य का सम्मान

आर्यजगत में विख्यात एवं प्रतिष्ठित विद्वान शास्त्रज्ञ पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी डा. सोमदेव शास्त्री जी के गुरु थे। उनकी सन् 1993 में प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर आपने उनकी स्मृति में एक पुरस्कार आरम्भ किया। इस पुरस्कार के लिए लिये भी आपने एक लाख रुपये की धनराशि प्रदान की थी। एक निधि के रूप में इस धनराशि को आर्यसमाज सान्ताक्रूज के कोष में जमा कराया गया है। इस निधि से आर्यसमाज के एक विद्वान, जो आर्ष पाठ विधि से अष्टाध्यायी महाभाष्य पढ़ाते हैं, उनका ग्यारह हजार रुपये की धनराशि देकर सम्मान करते थे। अब यह राशि पन्द्रह हजार कर दी गई है। यह पुरस्कार वर्तमान समय में भी अस्तित्व में है और प्रत्येक इससे एक विद्वान व्याकरणाचार्य को सम्मानित किया जाता है।

स्वामी ओमानन्द सरस्वती जी का सम्मान एवं गुरुकुलों की आर्थिक सहायता

डा. सोमदेव शास्त्री जी गुरुकुल झज्जर में भी पढ़े। स्वामी ओमानन्द सरस्वती गुरुकुल झज्जर के आचार्य थे। उनका यश आज भी आर्यसमाज में व्याप्त है। गुरुकुलीय प्रणाली से शिक्षित आर्यसमाज के अधिकांश विद्वान व संन्यासी आपके ही शिष्य रहे हैं। आपके बहुत से शिष्य वर्तमान समय में भी गुरुकुलों का संचालन कर रहे हैं। स्वामी जी का सम्मान होना चाहिये, यह विचार डा. सोमदेव शास्त्री जी के मन में आया। आपने इसकी योजना बनाई और स्वामी जी का सम्मान मुम्बई में किया गया। इस पुरस्कार के लिये ग्यारह लाख रुपयों की धनराशि एकत्र की गई थी। इस धनराशि को स्वामी जी को भेंट किया जाना था। इस सम्मान राशि के लिए आपने आर्यसमाज के लोगों से अपील की थी और अपनी ओर से भी इक्कीस हजार रुपयों का सहयोग किया था। सांसद एवं लोकसभा के अध्यक्ष रहे श्री बलराम जाखड़ की अध्यक्षता में स्वामी जी का मुम्बई में सम्मान किया गया था। स्वामी जी ने इस सम्मान राशि को आयोजकों को लौटा दिया और कहा कि इसकी स्थिर निधि बना दो और इससे गुरुकुलों को सहायता प्रदान करो। अतः इसकी स्थिर निधि बनाई गयी जो वर्तमान में आर्यसमाज काकड़वाड़ी में जमा है। इससे दस-बारह गुरुकुलों को आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। इसके लिए गुरुकुलों से आवेदन प्राप्त किये जाते हैं और उनकी दस से बारह हजार रुपये तक की सहायता की जाती है।

हम डा. सोमदेव शास्त्री को वर्तमान समय में ऋषि दयानन्द द्वारा बताये गये वेद मार्ग पर समर्पण भाव से चलने वाला विद्वान पाते हैं। डा. सोमदेव शास्त्री जी आर्यसमाज का गौरव हैं। उनका जीवन एवं कार्य ऋषिभक्तों के लिये प्रेरणादायक हैं। हम उनका हृदय से अभिनन्दन करते हैं और लेखनी को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य