कविता

अज्ञान-धुंध

आज धुंध के कारण हमको,
पथ आगे का ओझल लगता,
आज धुंध के कारण मानो,
सूरज भी फीका-सा लगता.

आज धुंध के कारण ही तो,
गाड़ी से गाड़ी टकराई,
चाल बसों की धीमी पड़ गई,
हवाई उड़ान में बाधा आई.

आज धुंध के कारण ही तो,
पक्षी आकुल हैं, व्याकुल हैं,
सहमे-सहमे प्राणी सारे,
मुरझाया फूलों का कुल है.

आज धुंध के कारण ही तो,
मानव-मन भी उलझ गया है,
उसके कार्य न पूर्ण हो सके,
जीवन मानो उलट गया है.

आज धुंध के बादल छाए,
कल ये बादल छंट जाएंगे,
मानव-मन पर हैं जो छाए,
अज्ञान-जलद कब छंट पाएंगे.

जब तक ज्ञान का सूर्य न चमके,
अज्ञान-धुंध का नाश न होगा,
ज्ञान-पुञ्ज के तेज ताप से,
अज्ञान-धुंध का नाश ही होगा.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244