कविता

अब चुप्पी ही बोले शायद

अब चुप्पी ही बोले शायद,

उनकी बीमारी से ज्यादा एहसास,
उनके चुपचाप रहने का था ,
खरी खरी बातें सुनाने के  आदी ,
दर्द से चुप,
उनकी चुप्पी से
हम लोग असहय दर्द से थे ,
कभी रात के तीसरे पहर,
गहरी नींद के किनारे,
गुनगुनाते  के बोल,
नींद को और गुनगुना कर देते|
मां करवट बदलकर पानी के लिए पूछती,
झिगुरों से आती आवाजों से लगता,
गहरी रात है कहीं बाहर,
मेरे पलंग के आसपास सुबह,
दस बजे ही झांकती ,
पिताजी लानत सलामत भेजते,
आने वाली  शंकाओं को जन्म देते,
और निकम्मे पन मिसालें देते,
ताजपोशी के लिए कोई,
लिजलिजी उपमा परोसी जाती,
जो खिड़की के रास्ते बाहर चली जाती,
खामियांजे  मैं तुरंत उठकर हाथ मुंह धोना पड़ता,
अम्मा मुस्कुराती चाय के लिए पतीली चढ़ाती,
ज्यादातर काढ़ा  कम दूध की  चाय नसीब होती,
मेरे जाहिल, निकम्मे पन की  पहचान और
पिताजी के बहुत पहले रिटायर होने की परिणति,
घर के बर्तनों और खाने के सामानों में दिखती,
धुंए का स्वाद भी होता चाय में,
पिताजी की कविताएं उनकी पूंजी थी,
कभी कभी चुपके चुपके मैं भी पढ़ लिया करता था,
आमने सामने तलवार खींची रहती थी,
एक दूसरे की बातें बकवास और,
उपदेश से ज्यादा नहीं लगती थीं ,
मुझे लगता उपदेश, गए वक्त की बातें हैं,
भला अब किस काम की,
उन्हें लगता  कहां खोट  हो गई,
ऐसी निकम्मी औलाद पैदा हुई,
माँ निर्विकार काम में लगी होती,
शीत युद्ध और परमाणु युद्ध की सेतु,
कुछ ना बोल कर भी सब कुछ बोल जातीँ|
आज एक नई समस्या है?
बातों का जनक रुग्ण,
चुप है ,
कहां से शुरू हो बतियाना,
मां चुप है,
मुझे बोलना आता नहीं,
बातों का जनक रुग्न शांत है,
अजीब सी चुप्पी है ,
अब चुप्पी ही बोले शायद,

— संजीव ठाकुर

संजीव ठाकुर

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