कविता

जिन्दगी का सच

खाली हाथ आये थे,  खाली हाथ जाना है,
इस भाग दौड़ के जीवन में थोड़ा सुख पाना है,
.जीवन क्या है रेत का दरिया,
मुट्ठी मे जिसे कोई बांध ना पाया है,
सब  किसके पीछे भाग रहे हैं पता नहीं,
धन दौलत सब यही रह जाता है,
सब अपने में मस्त हैं, औरों की किसी को खबर नहीं,
किसी के चहरे पर मुस्कान ला दे  इससे बड़ी कोई खुशी नहीं,
मन व्यथित हो रहा है,
बहुत सारी इच्छाएं पूरी न हुई,
चार दिन की जिंदगी है,
कब हाथ से फिसल जाये कह नहींसकते,
हस लो गा लो मौज मना लो,
प्यार का दीपक सबके दिलो में जला दो,
कर्म ही साथ जायेगा यह सबको समझा दे,
सासो की गणना कर कर के हम यह भूल गए,
मुट्ठी बांधे आये थे हाथ पसारे जाना है। ।
— गरिमा लखनवी

गरिमा लखनवी

दयानंद कन्या इंटर कालेज महानगर लखनऊ में कंप्यूटर शिक्षक शौक कवितायेँ और लेख लिखना मोबाइल नो. 9889989384