कविता

आहट नये साल की

हौले हौले मद्धम पग भर आ रहा है नया साल
दिल के भीतर सुलग रहे हैं फिर कुछ अनुत्तरित सवाल
अब कैसे रोली चंदन हो, कैसे इसका अभिनंदन हो….
यह साल जो बीता, हलकान कर गया
जीते जी कईयों को बेजान कर गया।
वर्षों की परंपरा पीछे छूट रही है
खौफ के साए में जिंदगी बीत रही है,
हाले दिल कैसे बताएं, कैसे अनुभव गीत सुनाएं
क्या समझा-सीखा हमने, स्वरक्षा में क्या कदम उठाए…..
कितना दोष मानव का इसमें कि जीवन संकट आन पड़ा
मृत्यु शैय्या भी सिहर उठी है ऐसा पहली बार हुआ,
आत्मावलोकन करना होगा,अब की बार संभालना होगा।

अमृता पान्डे

मैं हल्द्वानी, नैनीताल ,उत्तराखंड की निवासी हूं। 20 वर्षों तक शिक्षण कार्य करने के उपरांत अब लेखन कार्य कर रही हूं।