सामाजिक

समय बदला हम कब बदलेंगे

अनमना सबकी नफ़रत का मारा 2020 का साल भी चला गया, ओर भी कई साल आएंगे चले जाएंगे। वक्त का काम है बदलना दिन महीने साल बदलते रहते है, पुराना छूटता है नयापन सबको पसंद है परिवर्तन संसार का नियम है हर चीज़ में होता रहता है। पर क्या हम बदलते है ? हमारे वाणी, वर्तन या व्यवहार में बदलाव आया है ? कोई कभी ये क्यूँ नहीं सोचता की हाँ चलो थोड़ा खुद के अंदर भी नयापन लाते है थोड़ा बदलकर देखते है।
2020 का अफ़रा तफ़री वाला साल हमें पसंद नहीं आया। तो सोचो हमारे भीतर की कुछ वैचारिक शैतानियां भी हमारे आसपास बसे हमारे अपनों को कैसे पसंद आती होगी। वक्त के साथ दिमागी कसरत करते हमें खुद में भी बदलाव लाना चाहिए। ठहरे हुए पानी से बदबू आने लगती है वैसे ही जड़ विचारों में भी जंक लगने लगता है। इंसानी दिमाग बैर भाव और नकारात्मक जड़ता से भरा कारखाना है, रिश्तों में मिठास बनी रहे, एकता और भाईचारा बना रहे उसके लिए सकारात्मक ऊर्जा को खुद में भरते हुए हम सबके दिमाग जो डस्टबिन बन गए है उसमें से नकारात्मक और विद्रोही खयालों का कचरा साफ़ करके हंसी, खुशी, अपनेपन और मस्ती का आलम जगाना चाहिए। छोटी-छोटी बातों पर बुरा मानना, गुस्सा करना, किसीके प्रति नफ़रत का भाव या अकडूपन छोड़ कर सौहार्द भाव से भीतर की ऊर्जा को जगाना चाहिए।
 हर शै में हम परिवर्तन चाहते है, नये की आस रखते है तो शुरुआत खुद से हो तो बेहतर होगा। हम बदलेंगे तभी तो युग बदलेगा। मन की खिड़की खोलकर सुविचारित स्पंदन को आवाज़ दो भोर खिलेगी नये विचारों की, सकारात्मक सोच की किरणें जब फूटेगी तब खुद में परिवर्तन महसूस होगा। हर चीज़ में हर क्रिया में प्रेम छिपा होता है बस जरूरत है अपनी सरलता का दामन फैलाकर बटोरने की।
सामने वाले की गलतीयाँ हमें नज़र आती है कभी खुद के भीतर भी झांक कर देखना चाहिए भंडार भरा है नकारात्मकता और बौनी सोच का। सलाह देना और किसी ओर की गलती निकालना बहुत आसान है, पर योग्य तब होगा जब खुद के भीतर पहली नींव रखेंगे स्व परिवर्तन की। समय के साथ नयापन अपना कर खुद में बदलाव लाएंगे तभी आसपास की गतिविधियों को बदलता महसूस करेंगे। हर पुराने का नाश करते छोड़ देते है हम तो पुराने जड़ विचारों का अग्नि संस्कार किया जाए तो खुद के भीतर एक नये जीवन को महसूस करेंगे। तो क्यूँ ना 2021 में “एक किस खुद को” चूम कर खुद को निखारा जाए।
— भावना ठाकर

*भावना ठाकर

बेंगलोर