कविता

उत्तराखंड त्रासदी

एक जलजला जल का,
चल पड़ा उदगम से
हिमाच्छित पर्वतों से,
निकल पड़ा मैदानों को,
समेट सारा अपनी लय में,
देख, भागा मानव भय में।।

उन्मुक्त आज ये बवंडर,
तबाही का हर तरफ मंजर ,
समा गया , पथ में जो आया,
लगता, दम्भ तोड़ने ये आया।।

क्या पुल , क्या कंगूरे,
क्या मंदिर , क्या मीनारें,
जो कल था आज नहीं,
बह गया सब इसमें कहीं ।।

प्रकृति का उपहास न करें,
सम्मान आओ इसका करें,
वरना,बिखर जाएंगे सब यहीं,
जीवन फिर न रहेगा कहीं।।

डॉ. सारिका ठाकुर "जागृति"

ग्वालियर (म.प्र)