कविता

छोटी छोटी बनी मढैया

छोटी छोटी बनी मढैया, घास फूंस की पडी हो छैया,
मिट्टी की दीवारें उसकी, धरती पर गोबर की लिपैया।
फल फूलों के पेड़ घने हों, तितली भौंरे नाच रहे हों,
सुबह शाम को चिड़िया तोते, गीत सुनाएं ता ता थैया।
पवन संग कुछ बातें भी हों, वर्षा में भीगें नाचें,
राहगीर कोई तपता आये, पहले पानी फिर बैठे छैया।
हरियाली खेतों में आये, जल मिले फसलें मुस्कायें,
भरे हुये हों खलिहान जब, भरी हुई हों ताल तलैया।
चाहत अपनी किसी गांव में, ऐसी ही हो रठान मेरी,
मेरे बैल हों मोनू सोनू, कृष्ण प्यारी हो  काली गैया।
अमृत सा मैं दूध पीऊं, उसके बच्चों संग खेलूं,
सुबह सवेरे मट्ठा मक्खन, मां लेती हो मेरी बलैया।
— अ कीर्ति वर्द्धन