सामाजिक

शरीर की चर्बी जला कर लोगों को सुख देते हैं रिक्शा चालक

वैसे तो समस्त देशों में रिक्शा चालक पाए जाते हैं। परंतु अलग-अलग देशों में अलग-अलग सुविधएं और समस्याएं होती हैं रिक्शा चालकों की। केवल पहाड़ी क्षेत्रों में रिक्शा नहीं पाए जाते अगर हों भी तो समतल क्षेत्रा में। दीर्घ से दीर्घ वाहन अस्तित्व में आ चुके हैं, मगर रिक्शे का महत्त्व आज भी कम नहीं हुआ। जहां वाहन नहीं जा सकते वहां रिक्शा जा सकता है। बस इत्यादि की तरह इंतजार नहीं करवाता रिक्शा। तीन पहियावाहन रिक्शा जीवन का एक हिस्सा है। रिक्शे की कई किस्में हो सकती हैं परंतु इसकी विज्ञानक तकनीकी बुनियाद एक सी होती है। जहां निधर््न रिक्शा चालकों को रिक्शा रोटी देता है वहां निधर््न एवं समस्त वर्ग, ध्र्म, ध्नाढ़य-निधर््न सबको सुख प्रदान करता है। मानव ज़िंदगी से रिक्शा मनफी नहीं किया जा सकता। चालक के पैर और पैडल संघर्ष करते हैं, किराए की बाती से चालक की चर्बी का तेल जलता है, और यह दीपक जलता है बुझता है, बुझता फिर जलता, और अनवरत ज़िंदगी भर ऐसे ही जलता बुझता हुआ, परिवार के सुख के आंगन में टिमटिमाती रहती है इसकी रौशनी। इस रौशनी से बच्चों की ज़िंदगी, बूढ़े मां बाप का सहारा और रिश्ते-नातों का मामूली सा अंध्ेरा दूरा होता रहता है। थकन और टूटन का नाम है रिक्शा चालक। तंगदस्ती और मज़बूरियों की सड़क पर दौड़ता चला जाता है रिक्शा। जिससे ज़िंदगी को मिलती है मालूमी सी ज़िंदगी।
रिक्शा चालक रिक्शे की पूजा करते हैं, जो स्थान रोटी देता है, जिजीतिषा देता है वह पूजा-अर्चना का वर्याय ही तो होता है। कोई भी मौसम हो चाहे आंध्ी या तूफ़ान, या मूसलाधर बारिश, गर्मी या सर्दी रिक्शा तो चलेगा ही चलेगा, यह ही तो रिक्शे का मुक्कदर है। रिक्शे की परिभाषा है मां की तरह, सुख देती है, दुख लेती है। फिर भी सुखी।
जब कहीं किशोरावस्था के बच्चे रिक्शा चला कर रोटी का जुगाड़ करते हैं तो हृदय में एक सूल सी चुभती है। हमारे देश में हजारों बच्चे रिक्शा चला कर अपने घर का पेट पालते हैं। चाहे सवारी ढोह कर या रिक्शे पर बेकार वस्तुएं इक्ट्ठी करके कबाड़ियों के पास बेचना। कानून तो बना है, परंतु निधर््न बच्चों पर नहीं, सब देखते हैं, जिनका फर्ज है बच्चों को मज़दूरी करने से रोकना वे ही सब करलाते हैं। फिर भी रिक्शा दौड़ता है।
रिक्शा चालकों के एक अध्यक्ष तिलकराज शर्मा से मुलाकात करने का अवसर मिला उनके साथ कुछ रिक्शा चालक भी थे। उन्होंने कहा पिछड़े क्षेत्रा की ओर रिक्शा मज़दूरों की अनेकानेक समस्याओं को मद्देनज़र रखते हुए 1976-77 में रिक्शा यूनियन का गठन किया गया। रिक्शा चालकों में अनुशासन, नियम, एक्ता इत्यादि को बरकरार रखने के लिए ही इस यूनियन का संगठन हुआ। पुलिस एवं शरारती लोगों की ज़्यादतियां रोकने के लिए भी इस यूनियन ने कदम उठाए। उन्होंने कहा कि इस यूनियन का चुनाव दो वर्ष के बाद होता है। कोई निर्धरित चन्दा नहीं है। जरूरत पड़ने पर चन्दा लिया जाता है। इस यूनियन से संबंध्ति लगभग पांच सौ रिक्शा चालकों के शिनाख्ती कार्ड बन चुके हैं तथा और भी बन रहे हैं। इन कार्डों का उनको बहुत फयदा होता है, जैसे देर रात तक किसी सवारी को छोड़ कर आना पड़े तो पुलिस की पूछताछ के समय यह शिनाख्ती कार्ड उपयोगी एवं साहय होते हैं। पुलिस की परेशानी से बचा जा सकता है। इस पिछड़े क्षेत्रा में लगभग एक हजार के करीब रिक्शा चालक हैं। लगभग आध्े गांवों से शहर में आते हैं और आध्े शहर के ही रिक्शा चालक हैं।
उन्होंने कहा कि यह एक सस्ता रोज़गार है, मनमर्जी से, अपनी इच्छा एवं समर्था से किया जा सकता है, किसी की कोई पाबंदी नहीं। एक रिक्शा लगभग बारह हजार रूपए तक मिल जाता है। रिक्शे अमृतसर, जालंध्र, लुध्यिाना इत्यादि शहरों से आसानी से खरीदे जा सकते हैं। ट्टण पर भी मिल जाते हैं। तीन सौ से ऊपर रिक्शा ध्नाढ़य लोगों के हैं और सभी कस्बों शहरों में ध्नाढ़य लोग रिक्शा किराए पर देते हैं चालकों को। एक दिन का बीस या तीस रूपए किराया मालिक को देते हैं रिक्शा चालक। ज़्यादातर बाहरी राज्यों के मज़दूर ;रिक्शा चालकद्ध ही रिक्शा चलाते हैं।
उन्होंने कहा कि यूनियन बनने से रिक्शा चालकों एवं सवारी दोनों को इसका फायदा होता है। कई मसलों का यूनियन ने निपटारा किया है। यूनियन से रिक्शा चालकों में गड़बड़ नहीं होती। लाइन से, क्रमानुसार ही रिक्शा चलते हैं। इससे इनुशासन बना रहता है और परेशानी नहीं उठानी पड़ती। जो भी रिक्शा चालक सवारी छोड़ कर आता है वह सबसे पीछे रिक्शा ले जाता है। जब पहले यह नियम या यूनियन नहीं थी तो रिक्शा चालकों एवं सवारी को परेशिानियां उठानी पड़ती थीं। सुबह चार बजे से रात देर तक आती-जाती बसें तथा रेलगाड़ियों के साथ-साथ रिक्शा चालकों की मेहनत चलती है। बड़े शहरों में तो सारी-सारी रात रिक्शा चलते हैं। अगर कोई रिक्शा चालक देर रात को किसी सवारी से दुगने पैसे मांगता है तो उसे यह कहा जाता है कि नाज़ायज पैसे मांगता है। देखा जाए तो जब एक रिक्शा चालक रात को जाग कर सवारी की प्रतीक्षा करके, अपने परिवार बच्चों से दूर रह कर, और स्वयं जोखिम में पड़कर सवारी को ठीक समय, ठीक स्थान पर पहुंचाता है तो उसकी एस मेहनत के दुगने पैसों को नाज़ायज नहीं कहना चाहिए। कोई कर्मचारी डब्ल सिफट पर काम करता है तो उसे डब्ल पैसे ही मिलने चाहिए। एक रिक्शा चालक की मेहनत से इतनी नफ़रत क्यों? लोग तो रिक्शा चालक को इन्सान ही नहीं समझते। हमारे देश में तो मज़दूर होना भी गुनाह है। उन्होंने कहा कि रिक्शा मज़दूर को तमीज़ से कोई नहीं बुलाता। जबकि वह देश के नागरिकों को पूरा-पूरा सहयोग देते हैं, अपनी निर्बल टांगों को मशीन की भांति चला कर। रिक्शा चालक की खुराक न के बराबर, केवल रूखी-सूखी रोटी पर चल कर लोगों को सुख-सुविध प्रदान करता है और फिर भी वह समाज में। नफरत का पात्रा क्यों? रिक्शा चालकों को भी देश का भविष्य, देश का नागरिक समझा जाए और अच्छे व्यवहार से उसे पुकारा जाए। देश की पखितम शक्त में उसका भी योगदान है। उन्होंने कहा कि स्थानीय नगर पालिका को लगभग 20 रूपए वर्ष के देते हैं। मगर हमारी कई परेशानियां, समस्याएं हैं, जिनकी ओर कोई ध्यान नहीं देता। सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब कोई बड़ा नेता शहर में आता है या कोई वी.आई.पी. आता है तो रिक्शा वालों को एक नुक्कड़ में ध्केल दिया जाता है। जब कि शहर में स्कूटर, साईकल, बसें, कारें इत्यादि वाहन चलते हैं तो केवल रिक्शा चालकों को ही क्यों परेशान किया जाता है? ऐसा नहीं होना चाहिए। जितनी देर नेता या वी.आई.पी. शहर में रहेगा उतनी देर तक रिक्शा चालकों को मुसीबत में बने रहना होता है। उस दिन दिहाड़ी ही नहीं बनती। पुलिस ज़्यादा तंग करती है। सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि कुछ पुलिस वाले या शराबी मुश्किल से ही पैसे निकालते हैं।
उन्होंने कहा कि छोटे शहर में एक रिक्शा चालक लगभग बीस किलोमीटर तक रिक्शा चला लेता है। उसकी थकावट का ट्टण कोई नहीं दे सकता। अध्यक्ष ने कहा कि रिक्शा मज़दूरों के लिए सुविधएं नहीं हैं। सुबह से निकल कर रात को घर आना। अपने बच्चों की तरफ ध्यान नहीं दिया जा सकता, यहां तक बच्चे अच्छी तरह पढ़ाई नहीं कर सकते। छठी-सातवीं कक्षा से आगे नहीं जाते। अध्कि फीसें, महंगी पुस्तकें, महंगी खुराक इत्यादि से वंचित रहते हैं रिक्शा मज़दूरों के बच्चे। अच्छा जीने के लिए कोई सुिवध नहीं। सरकार को इनके बच्चों के लिए विशेष सुविधएं हों तां कि यह बच्चे भी शिक्षित, स्वस्थ एवं नौकरी पेशा वाले बन सकें।
अध्यक्ष ने कहा कि रिक्शा चालकों का बीमा हो। सस्ते रेटों पर मकान दिए जाएं। अस्पतालों-डिस्पैंसरियों में निःशुल्क दवाएं दी जाएं। रिक्शा स्टैंड बनें, बिजली, पानी की सुविध हो इत्यादि। फिर भी रिक्शा और ज़िंदगी साथ साथ चलती रहेगी। सरकार को इनकी ओर ध्यान देना चाहिए।
— बलविन्दर ‘बालम’

बलविन्दर ‘बालम’

ओंकार नगर, गुरदासपुर (पंजाब) मो. 98156 25409