सामाजिक

परिवार को फैमली बनने से रोकिये

परिवार और फैमिली ये दोनों अलग-अलग शब्द हैं न कि एक दूसरे के अनुवाद। वास्तव में शब्दों की उतपत्ति उसकी वहां के लोगों की संस्कृति के आधार पर होती है इसलिए बहुत से शब्दों का अनुवाद हम करते तो हैं लेकिन वह गलत होता है। क्योंकि शब्द परम्परा, रीति-रिवाज के साथ बनाये जाते हैं जहाँ जैसी जिनकी परम्परा व रीति रिवाज होता है वहां उनकी वह परम्परा बन जाती है जैसे- एक भारतीय शब्द दान को ही लेते हैं तो भारत मे दान शब्द किसी एक सन्दर्भ में प्रयोग नही होता तो यहां दान के अलग-अलग भाव व परम्परा हैं। अर्थात गौदान, कन्यादान, गुप्तदान, दान आदि अलग- अलग समय पर अलग अलग भाव व्यक्त करते हैं। इस कारण अंग्रेजी शब्द ‘डोनेशन’ इन सभी प्रकार के दान का अनुवाद नही हो सकता उसी प्रकार परिवार शब्द का अंग्रेजी अनुवाद फैमली नही होता। फैमली का अंग्रेजी सभ्यता का मतलब है पति, पत्नी, बेटा, बेटी
अर्थात फैमली का अर्थ है कि एक ऐसा होम जिसमे एक से अधिक फैमिली एक साथ न रह रहे हों जैसे कि पति, पत्नी, और उनके बच्चे ही रहते हैं। इस परिवार में एक ही वैवाहिक जोड़ी और उसके बच्चे रह सकते हैं इसमें सास, ससुर, बेटे, बहु आदि नहीं रह सकते। किन्तु भारतीय शब्द परिवार का अर्थ है कि बाबा, दादी, माता, पिता, भाई, बहन, चाचा, चाची, ताऊ, ताई, देवर, भाभी, नाती, नातिन आदि मिलकर बनता है। परिवार एक व्यापकता होती है, जिसमें माता-पिता, बच्चे आदि शामिल होते हैं। परिवार संस्कृति का वाहक होता है। परिवार का आधार सहयोग, प्रेम, त्याग, श्रद्धा आदि है परिवार के सभी सदस्य भावनात्मक आधार पर एक दूसरे से संबंधित होते हैं। किन्तु आजकल भारत मे एक नया शब्द चल पड़ा है यानी जिस परिवार में सभी लोग हैं वहां बोलते हैं संयुक्त परिवार जबकि परिवार शब्द ही अपने मे पूर्ण है संयुक्त की कोई आवश्यकता ही नही है। और इसी भारतीय परिवार व्यवस्था के कारण ही भारत भारत है। यहां सभी मिलकर रहते हैं और आपसी हंसी मजाक, नोक झोंक के साथ ही सभी सबका उचित सम्मान आदर करते हैं और अपनी भारतीय रीति- रिवाज, परम्परा के आधार पर सबके साथ व्यवहार करते हैं यहां किसी के किये अनावश्यक रूप से कोई एक दिन फॉर्मेलिटी के लिये नही बनाया गया। इसके विपरीत ही पश्चिम की फैमली व्यवस्था होने के कारण उन्हें अलग से बहुत प्रकार के डे का निर्माण करना पड़ा। जैसे- मदर डे, फादर डे, ब्रदर डे, सिस्टर डे, मैरिज डे और न जाने कितने- कितने डे मनाने लगे इन सबका उन्हें मनाने का उनके पास कारण है कि उनके फैमली व्यवस्था होने के कारण कोई एक साथ नही रहते इसलिए उनको वर्ष में एक दिन मिलने के लिए यह डे व्यवस्था बनानी पड़ी। अब कुछ मूर्ख लोग उनकी इस मजबूरी को अपने साथ जोड़कर अंधानुकरण करने लगे और नए- नए डे निर्माण कर भारत में मनाने लगे यह एक प्रकार से मनाने वालों के लिए गाली भी है और अभिशाप भी। इसलिए सनातन धर्म के लिए पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण खतरा है। एक ओर जहां पश्चिम के लोग सनातनी संस्कृति को अपनाकर खुद को धन्य कर रहे हैं वहीं अज्ञानतावश एक भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग पश्चिम के प्रभाव में सामाजिक और नैतिक पतन की ओर अग्रसर है। पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रचलन से बच्चे भी प्रभावित हो रहे हैं। भारतीय सभ्यता व संस्कृति को भूलने लगे हैं। पश्चिमी जगत के प्रभाव से सहनशीलता जैसे गुण कम होते जा रहे हैं। माता-पिता उनकी बेहतरी के लिए कोई सुझाव देते हैं तो बच्चे उसे मानने को तैयार नहीं होते।
अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा, घर से दूर रहकर पढ़ाई, बड़े शहरों और विदेश में जॉब की ललक, पाश्चात्य परिवेश की ओर झुकाव और मोबाइल ने युवाओं को भारतीय संस्कृति से दूर कर दिया है। टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले अधिकतर सीरियल भी पश्चिमी संस्कृति को पोषित-पल्लवित करते हैं, जिससे युवा पीढ़ी प्रभावित होती है। इसलिए भारतीय परिवार व्यवस्था के साथ चलिए और अंधानुकरण से दूर होकर अपना व अपने बच्चों को स्वाभिमान युक्त बनाइये। और परिवार को फैमली होने से बचाइये।

*बाल भास्कर मिश्र

पता- बाल भाष्कर मिश्र "भारत" ग्राम व पोस्ट- कल्यानमल , जिला - हरदोई पिन- 241304 मो. 7860455047