कविता

शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा की रात चांदनी
खुशियों को समेटे आ गई
औषधीय गुणों से भरपूर किरणें
व्याधियां मिटाने आ गई ।।

कान्हा की जब मुरली बाजी
मधुर तान सुन गोपियां जागीं
सुध बुध तन मन की बिसरा के नंदलाल संग डोलन लागीं ।।

रूप ही इतना मनभावन था
दर्शन को आतुर जन-जन था
करोड़ों मदन भी देख लजाए
शोभा ऐसी कि वरन न जाए ।।

थी होठों पर मुस्कान निराली
चांदनी रात की बेला न्यारी
जमुना जी और बंसीवट पर
ब्रज मंडल की आभा प्यारी ।।

ब्रज की लता-पता सब बहकी
माटी निधिवन की यूं महकी
पशु- पक्षी भी धन्य हो गए विराट स्वरूप के दर्शन हो गए ।।

कौन कृष्ण है कौन है राधा
ऐसा प्रेम हर हृदय में जागा
ग्वाल-बाल और गोप- गोपियां
सभी में है कृष्ण सभी में है राधा

निधिवनजी में आज भी प्रतिदिन
प्रभु जी अनुपम रास रचाते
सहज नेत्रों से होय ना दर्शन
जब ‘मैं ‘ को मिटाएं तो
सुलभ हो जाते ।।

ऐसी लीला श्री कृष्ण रचाये
सभी के तन मन श्याम समाए
महा रास ऐसा कर डाला
सबको लगा बस श्याम हमारा
सबको लगा बस श्याम हमारा ।।

— नवल अग्रवाल

नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई