लघुकथा

ममता का आँचल!

अपनी दादी के काम में हांथ बंटाने दादी के साथ रोज आते थे राजा और रानी। उम्रदराज दादी। झुकी झुकी कमर। झुर्रियों से भरा चेहरा। सब का कचरा इकठ्ठा कर जो भी बचा-खुचा मिलता बड़े प्रेम से तीनों मिलकर खातें। “आजी..आजी ये लवकर”
जब तक आजी नहीं आती, दोनों हाथ मुंह धोकर तैयार रहते। ख़ुशी ख़ुशी जो मिलता खा लेते। ईर्ष्या से,अचंभे से देखती रह जाती मैं। अभावग्रस्त जीवन में खिलती खुशियां देख मैं स्तब्ध हो जाती। याद आता मुझे हमारे डायनिंग टेबल का नजारा,बच्चें खाना खाने बैठते तब किस तरह,तरह तरह के पकवान देख कर भी मुंह पर शिकन बनी रहती हैं।
“यह नहीं बना।”
“आज तो और कुछ खाने का मन था। ”
“ओहो रोज रोज वही,हम तो उकता गये है भई।”
“सलाद, सूप, चटपटा मजेदार कुछ तो बना लिया करो।”
श्रीमान जी कुछ कहे बगैर खाना खा ही नहीं सकते थे। शायद चिकचिक के बिना खाना हजम नहीं होता होगा। खैर मैं उन मासूम बच्चों से दोस्ती करना चाहती थी। घर में सब अपने अपने काम में व्यस्त थे। दो चार दिन राजा रानी नहीं दिखे,तो मैंने आजी से पूछ ही लिया,
“कैसे हैं बच्चें?आज कल क्यों नहीं आये?”
“अरे बीबी जी परीक्षाएं चल रही हैं । पढ़ रहें हैं बच्चे। बाजु में ही रहती हैं निर्मला दीदी,बड़ी अच्छी हैं। बच्चों को पढ़ाती हैं।”
“बच्चों के माता-पिता याने तुम्हारे बेटे-बहु कहाँ हैं?”
“क्या बताऊँ बीबी जी, दुबई नौकरी करने गए। हमारे पास बच्चों को रखकर। अब तक लौटे नहीं। कपडा लत्ता,मुझे साडी भेजते थे पहले,अब की न तो कोई संदेसा आया हैं,ना  ही बच्चों के लिए कुछ भेजा हैं। मजबूरन पेट की आग बुझाने मुझे घर से बाहर निकलना पड़ा। जैसे तैसे आप लोगों की दुआओं से पढ़ा रही हूँ। पाल-पोस रही हूँ। मेरी बेटी बड़ी सयानी हैं।राजा और रानी की स्कूल की फीस भर देती हैं। दोनों बच्चों को खूब पढ़ाएंगे,उसने ठान लिया हैं। अपने बच्चों-सा प्यार करती हैं वह। अपने भाई भाभी की सलामती के लिए दुआएं मांगती रहती हैं। आना चाहे या न चाहे, कम से कम इत्तला तो कर दे, कहा हैं वे, कैसे हैं। मैं आज हूँ, कल का क्या भरोसा? कौन संभालेगा इन्हें?”
आजी की आँखे भर आयी थी। बेटे बहु की लापरवाही से आहत थी वह। रुंधे गले से ईश्वर की ओर इशारा किया उसने। वही जाने उसके मन का खेल। हम तो कठपुतलियां हैं उसकी।आजी के जज्बे को सलाम करती मैं अपने काम में व्यस्त हो गयी। मन ही मन उसके बेटा-बहु के जल्द लौट आने की कामना करने लगी। सोच रही थी,काश,मंदिरों में चढ़ाया गया धन ऐसे प्रतिभाशाली,जरूरतमंद बच्चों के लिए उपयोग में लिया जाता? उनकी पढाई-लिखाई,दवा-दारू पर खर्च होता,मुझे लगता हैं,भगवान अति प्रसन्न होते,अपनी कृपा बरसातें। बच्चों का खोया अल्हड बचपन लौटा देना हे प्रभु। जगमगा देना उनका जीवन। उमंग,उल्लास से भरपूर। प्यार दुलार से,महकते फूलों से गुलजार हो जीवन।
दादी ने जैसे स्मृतियों को अपने आंचल में समेट लिया और अपने पोते-पोती के सुनहरे भविष्य के सपने बुनते हुए चल पड़ी। ममता के आँचल में अनमोल मोतियों-सी बच्चों को सहेजती दादी जी को आदरभाव से श्रद्धावनत हो मैंने सादर नमन किया।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८