कविता

सपनो के पीछे

सपनो के पीछे भागे फिरते हो क्यों ?
सपना भी कभी हुआ है —– अपना !
जितना सोचा था — आसान
पूरा करना हुआ उतना ही मुश्किल !
खुशनुमा फूलों की तरह है कोमल
तितलियां के मानिंद है रंगीन
हकीकत की धरातल तक आते -आते
हो जाती है मलिन
सपनो के पीछे भागे फिरते हो क्यों ?
सपना भी कभी हुआ है—- अपना !
सपनो की कशिश है ऐसी
जिसे दिल संजोए हर बारी
जब हो पूरा करने की बारी
दिल हो जाएं भारी-भारी
सपनो के पीछे भागे फिरते हो क्यों ?
सपना भी कभी हुआ है —- अपना!
थोड़ा जतन जो कर लेते
सपने हो जाते अपने
लेकिन थामे आलस की डोर
करते रहे अपना सर्वनाश
सपनो के पीछे भागे फिरते हो क्यों ?
सपना भी कभी हुआ है —– अपना !
— विभा कुमारी “नीरजा”

*विभा कुमारी 'नीरजा'

शिक्षा-हिन्दी में एम ए रुचि-पेन्टिग एवम् पाक-कला वतर्मान निवास-#४७६सेक्टर १५a नोएडा U.P