सामाजिक

दूसरी औरत में आख़िर क्या ढूँढते हो

“क्यूँ अपनी चौखट के चाँद में ही दाग नज़र आता है, परायों के दागदार माहताब में भी नूर नज़र आता है”
आजकल समाज में जो दिख रहा है, चल रहा है लग्नेत्तर संबंध का ड्रामा उस पर गौर करते एक सवाल उठता है कि, एक शादीशुदा मर्द दूसरी औरत में क्या तलाशता होगा? अपनी पत्नी चाहे कितनी भी सुंदर, सुशील और हर लिहाज से बेहतर क्यूँ न हो! पड़ोसन के नखरे ही क्यूँ भाता है? जिस पत्नी को अपनी पसंद बनाकर, अपनी मर्ज़ी से ब्याहता बनाकर लाते है फिर उसकी कौनसी कमी को यहाँ-वहाँ ढूँढते फिरते है? माना हर किसीको परफ़ेक्ट कुछ भी नहीं मिलता, कोई न कोई कमी हर इंसान में होती ही है; तो उस कमी से असंतुष्ट होते दूसरी औरत के प्रति मोह जगता होगा? या महज़ आकर्षण के चलते दूसरी औरत से रिश्ता बनाते होंगे? क्यूँ दूसरे चेहरे में अपनी पसंद ढूँढनी है? अपनी ही पत्नी को अपनी पसंद के मुताबिक ढ़ालने की कोशिश भी करनी चाहिए। क्या कभी बताया अपनी पत्नी को, कि तुम्हारे अंदर मुझे कुछ यूँ बदलाव चाहिए। मुझे तुम्हारा ऐसे रहना पसंद है, तुम्हारा ये काम करना पसंद है, क्यूँ न तुम ऐसे रहती हो! हर पत्नी ज़्यादातर अपने पति की पसंद में ढ़लने की कोशिश करती ही है। पर अगर किसी कारणवश नहीं कर पाती तो क्यूँ पति उसे उसकी उस कमी के साथ नहीं अपना पाता? उसका पर्याय ढूँढते पत्नी के प्रति बेवफ़ा हो जाना न्यायसंगत बात हरगिज़ नहीं। कभी-कभी तो पत्नी की बिना कोई कमी के भी पतियों को बाहरी संबंध बनाने होते है और उस पर शर्म तक नहीं करते अरे पत्नी के भीतर भी झाँक कर देखिए अपनी ही नज़र के सामने पति का दूसरी औरतों से फ़्लर्टिंग करना उसको कितनी तकलीफ़ देता है।
सोचिए आप में भी कोई तो कमी होगी ही! अगर पत्नी उस कमी से असंतुष्ट होते दूसरे मर्द में अपनी पसंद और खुशियाँ ढूँढते गैर मर्द से रिश्ता बनाएगी तो? क्या बर्दाश्त होगा आपको? एक लड़की जो अपना सबकुछ छोड़ कर एक पति के भरोसे ज़िंदगी का सफ़र तय करने अनजान रास्ते पर आँखें मूँदे चल पड़ती है पति के घर को, परिवार को, रिश्तेदारों को यहाँ तक की उनके पालतू कुत्ते तक को अपना कर प्यार करती है। अपना अस्तित्व खोकर पति को सर पर सजा लेती है, उसकी एक हल्की सी कमी दरगुज़र क्यूँ नहीं कर सकते?
पत्नी घर की नींव होती है, पुरुष का आधा अंग जिसके बिना घर, घर नहीं महज़ चार दीवारी कहलाता है। पत्नी पति की पहली प्रायोरिटी होनी चाहिए। कैसे उसका स्थान, उसका हक और उसके हिस्से का प्यार किसी ओर के साथ बाँट सकते हो? बाँटने वाले को तो समझे चलो, ज़्यादातर मर्दों की फ़ितरत ही भँवरे सी होती है। पर ऐसे मर्दों से रिश्ता बनाने वाली औरतें एक औरत होकर दूसरी औरत के पति से कोई स्त्री प्यार कैसे कर सकती है? कैसे एक औरत के जीवन में बवंडर ला सकती है? किस हक से उस मर्द को अपना प्यार कह सकती है जबकि वो पुरुष किसी ओर की अमानत है, किसी ओर का प्यार है, बच्चों का पिता और किसी एक परिवार का स्तंभ है। अपने स्वार्थ और रंग रैलियों के लिए क्या किसीका बसा बसाया घर तोड़ना लाज़मी है? ये प्यार नहीं होता महज़ आकर्षण होता है, दूसरे की थाली का लड्डु बड़ा दिखता है।
जब किसी पत्नी को पता चलता है कि उसके पति की लाइफ़ में कोई दूसरी औरत के लिए भी एक कोना रिज़र्व है तब टूट जाती है, बिखर जाती है, पागल हो जाती है। अपनी ज़िंदगी किसी ओर के साथ बाँटना उसे हरगिज़ मंज़ूर नहीं होता। उसे सपनों का महल ढ़हता हुआ नज़र आता है, मार दूँ या मर जाऊँ वाली भावना उस पत्नी को चैन से जीने नहीं देती।
जो पत्नियाँ पति के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर का विद्रोह नहीं कर सकती वो कभी कभार स्वीकार भी कर लेती है। पर उसके सीने से जो हाय निकलती है न, वो दिखती भले नहीं; धोखा देने वालों को तबाह कर देती है। तो क्यूँ किसी मासूम के दिल से खिलवाड़ करके आपको ज़िंदगी का मज़ा लेना है? कभी-कभी एक खून भी माफ़ होता है, तो पत्नी की एक कमी की इतनी बड़ी सज़ा क्यूँ?
— भावना ठाकर ‘भावु’

*भावना ठाकर

बेंगलोर