मुक्तक/दोहा

बेटा- बेटी

न बेटी ख़राब है और न बेटा ख़राब है,
कुछ ख़राब है तो, नज़रिया ख़राब है।
बाँटते हैं बच्चों को, निज स्वार्थ देखकर,
बेटी का मैका अच्छा, ससुराल ख़राब है।
बेटे दिवाने बीबी के, हमारी सुनते नहीं जरा,
दामाद दिवाना बेटी का, सोना बिल्कुल खरा।
दामाद को मिले मान, बेटों को अपमान क्यों,
बहु को भी माने बेटी, घर रहेगा हरा- भरा।
देना संस्कार बेटी को, फ़िक्र छोड़ कर हमारी,
ससुराल में सास ससुर, लुटा दे ख़ुशियाँ सारी।
कौन है श्रेष्ठ बेटा- बहू, या बेटी- दामाद घर के,
पल भर में बदल जायेगी तब, सब सोच तुम्हारी।
— अ कीर्ति वर्द्धन