गीत/नवगीत

नव गीता गढ़ना होगा

जब चोर-उचक्के और मवाली, घर-घर पूजे जायेंगे
जब कानूनी षड्यंत्रों को बुन, नेता जाल बिछाएँगे

जब देशद्रोहियों की मौतों पर, मजहब अश्क बहायेगा
खूंखार-दरिंदों का जीवन, वीरों संग तौला जायेगा

जब तक दिल्ली की पंचायत में, गिद्धों की टोली होगी
गिरगिट-रंगे सियारों की जब तक भरती झोली होगी

जयचंद-विभीषण-जाफर जब, मिलकर के गान सुनायेंगे
जब मुट्ठी भर जुगनू मिलकर, सूरज को आँख दिखायेंगे

अमर तिरंगे का कद जब जब, हिमगिरि से बौना होगा
दहका हिंसा के शोलों से, भारत माँ का कोना होगा

जब सत्ता के दुश्शासन मिलकर, संविधान को नोंचेंगे
भीष्म-द्रोण कर्तव्यविमुख हो तब भी, कुछ ना सोचेंगे

तब चक्र सुदर्शन धर कर में, केशव को रण करना होगा
लातों कें भूतों को समझाने, नव गीता गढ़ना होगा।

जो रक्षा करे उसूलों की, कानून उसी को कहते हैं
जो आँखें पोछे दुर्बल की, कानून उसी को कहते हैं

जो एक आँख से सब देखे, कानून उसी को कहते हैं
हो मजहब-पंथों से ऊपर, कानून उसी को कहते हैं

आततायियों और जालिमों के लिए कोई विधान नहीं
षठ् संग षठ् की हो भाषा, दूजी कोई और ज़ुबान नहीं

लाठी जिसकी भैंसी हाँके, यह सूत्र बदलना ही होगा
लोकतंत्र के मंदिर की, फिर नींव नयी धरना होगा

बाबा आदम की परिपाटी से, मंज्रिल ना मिल पायेगी
सदियों से छली गयी जनता, सदियों तक छलती जायेगी

बंदर गर स्वाद ना जाने तो, ना अदरक को बरबाद करो
फन कुचलो विषधर का पहले, ना हाथ जोड़ फरियाद करो

जब शकुनि- कर्ण-दुयोधन, नीति का पाठ पढ़ाते हों
जब कौवे-मेंढक और झींगुर , बेसुर में राग सुनाते हों

तब त्याग बाँसुरी की सरगम, पांचजन्य धरना होगा
लातों कें भूतों को समझाने, नव गीता गढ़ना होगा। 2।

छोटा सा अंकुर भी इक दिन, पेड़ घना तन जाता है
घाव का उपचार ना हो तो, ज़ख़्म ज़हर बन जाता है

काँटा जब देह में धँस जाए, काँटा ही काम में आता है
लोहे के टुकड़े करने को, लोहे से काटा जाता है

निरपराध ना होवें दंडित, ये कानून ज़रूरी है पर
महिमामंडन अपराधी की, कौन सी ये मजबूरी है?

एक विधान रचो ऐसा कि, ज़ुल्म वतन से खो जाएँ
अपराधों की रूह हो कंपित, कोख बाँझ सब हो जाएँ

राजनीति बदमाशी को जब, हँसकर दूध पिलाती है
लोकतंत्र की शाखाओं पर, अमरबेल मुसक्याती है

न्याय देवी का चीरहरण कर, और न अब पाखंड करो
दूजी गलती ना कर पाये, शिशुपाल के खंड करो

संघर्ष नया रणक्षेत्र नया, संग्राम नया करना होगा
लातों कें भूतों को समझाने, नव गीता गढ़ना होगा। 3।

— शरद  सुनेरी