कविता

वृक्ष

मैं वृक्ष मनुज की सांसे हूँ |
वसुधा के पावन गहने हूँ |
मुझसे बहार मुझसे जीवन,
जन मन के मोहक सपने हूँ |

मेरी बाहों को मत काटो |
जंगल उपवन को मत छांटो|
सारी खुशियाँ लुट जाएंगी,
झीलों,तालों को मत पाटो |

खगकुल का मैं ही डेरा हूँ |
बरखा बसन्त का घेरा हूँ |
मैं हूँ जबतक जीवन तबतक ,
खुशियों का सदा बसेरा हूँ|

अल्लढ़ अलमस्त झरोखा हूँ |
मैं मलय पवन का झोंका हूँ |
घन मुझको देख बरसते हैं,
ऋतुओं की मोहक शोभा हूँ |

पर्वत ,नदियाँ, झीलों, झरनों, वृक्षों से धरती की शोभा |
मुझसेस वातायन मुझसे जन मुझसे ही जीवन की शोभा |
हे मानव काट न दोहन कर जीवन आंनद उजाड़ न तू ,
मत लूट न मौसम की खुशबू ,अब आन बचा भू की शोभा |
मंजूषा श्रीवास्तव’मृदुल’

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016