कविता

अनदेखा श्रम 

जेठ की चिलचिलाती धूप में, 

भूलकर गर्मी का अहसास 

अथवा 

हड्डियाँ जमाती सर्दी में 

जाता है पिता काम पर 

खेत में मजदूरी पर 

या खींचता है ठेला 

बेचता है गली गली घूमकर 

फल या सब्जियां। 

सोचता है 

किस तरह बच्चे पढ़ें 

पत्नी व माँ बाप खुश रहें। 

सर्दियों की 

गुनगुनी धूप को तरसती पत्नी 

नहीं सोचती 

अपने पति के श्रम का महत्व 

अपितु 

वह चिल्लाती है 

और ताने देती है 

अपने दिन भर घर में खटने के 

तथा कुछ ख्वाब 

अधुरे रहने के 

जो देखे थे उसने 

अपने बचपन में 

जो पूरा न हो सके थे 

पिता के घर 

उनकी गरीबी के कारण 

और समझती रही वह 

अपने पति का दायित्व 

बिना जाने पति की सामर्थ्य 

तथा 

अनदेखा कर उसका श्रम। 

 — अ कीर्ति वर्द्धन