गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

आज देखो देश में क्या हो रहा है
बीज हर कोई बैर के ही बो रहा है

आज ताक़त हमारी तुम न परखो
दिन – ब – दिन इसमें इज़ाफ़ा हो रहा है

दास्तां मैं तो सुनाऊँ बस तुम्हें ही
आज तक दिल बोझ कितना भी रहा है

आज फुर्सत में रहे बस सोचते ही
दिल किसी की याद में क्यों खो रहा है

आशिक़ी में बदगुमां तुम हो न जाना
प्यार दिल में देख अपार पिरो रहा है

बावफ़ा से क्या उसे लेना व देना
बेफ़िकर सारा ज़माना सो रहा है

दिल्लगी में जो लगी दिल में रहे
ज़ख़्म क्यों तू आँसुओं से दो रहा है

— रवि रश्मि ‘अनुभूति ‘