धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

मनोकामना मां की

नवरात्रि का पर्व चल रहा था। मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगी रहती थी। सभी सामने से माता जी की स्नेहमय प्रतिमा के दर्शन कर, बहुत खुश हो रहे थे। सप्तमी के दिन वनिता जी भी अपने बहू और पोते के साथ मंदिर गई थीं। सभी को अप्रतिम आनंद आ रही थी।सभी भक्तगण हाथ में दीया ले कर आरती कर रहे थे।भक्ति की लहर बह रही थी। आरती समाप्त होने के बाद भजन कीर्तन पूजन प्रारम्भ हो गया था।लाउडस्पीकर पर सतत भजन कीर्तन वातावरण को भक्तिमय बना रहे थे। आरती के पश्चात माँ दुर्गा का आव्हान करके विभिन्न प्रकार के मिष्ठान्नों का भोग लगाया गया। तत्पश्चात् पुजारी ने सभी भक्तों से कहा कि वे माता रानी से अपनी मनोकामना कहें और विनती करें कि वह शीघ्र हो पूर्ण हो। सभी भक्त मां के सामने आंखें बन्द कर हाथ जोड़ कर अपने मन की मनोकामना मन ही मन मां को सुनाने लगे। वनिता जी ने जब देखा कि सभी आँख बंद किए हाथ जोड़ कर प्रार्थना कर रहे थे। तब वनिता जी भी आंखें बंद कर माता रानी से इन सबकी मनोकामना अवश्य ही पूर्ण करें। लौटते समय बहू ने सुनीता जी पूछा ,’मम्मीजी आपने माता जी से क्या मांगा?’ ऐसे तो कुछ भी नहीं,पर सभी भक्तों की मनोकामना पूर्ण हो, साथ ही दुनिया भर के हर प्राणी के सकुशल जीवन, सुख समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल संसार का आशीर्वाद माँगा है। सुनीता जी ने बहू को बताया बहू को बड़ा आश्चर्य हुआ, उसने सुनीता जी से क्या माँ जी मांगना ही था तो कुछ अपने और हम सबके लिए मांगना चाहिए था, लेकिन आप तो…….। सुनीता जी ने बहू को समझाया दुनिया भर में हम तुम और हमारा परिवार भी तो है। अपने लिए तो सभी चाहते हैं औरों के लिए कौन मांगता है, लेकिन जब हम बड़ा दिल दिखाते हैं तो खुद को भी अच्छा लगता है। और तब अनगिनत लोगों की भावनाओं से हम अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ते हैं,जिसका प्रतिफल जो मिलता है,वो हमारे समझ में नहीं आता लेकिन उसमें अनजाने लोगों की बिना किसी दबाव या स्वार्थ के अनंत दुआओं का सम्मिश्रण होता है,जिसे मांग कर पाना असंभव है, शायद माता जी भी हमारी मांग पर उतना दे पाने में अस्मर्थ होतीं। वनिता जी की बहू को कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने कहा- आप जो कह रही हैं, वो मेरी समझ में नहीं आया, शायद माता जी की भी समझ में न आया हो।ऐसा ही तो नहीं है माता जी भी हमारी मांग नहीं हमारी भावना देखती हैं, और उसी के अनुरूप ही कुछ देती हैं।आज जो कुछ भी तुम इस परिवार में देख रही हो वो सब उन दुआओं का परिणाम है जो माता जी की कृपा से हमें और हमारे परिवार को मिला है, तुम शायद विश्वास नहीं करोगी, माता जी के मंदिर में वर्षों से आना जाना है लेकिन मैंने आज तक अपने लिए कुछ नहीं मांगा। सिर्फ सबकी खुशहाली का ही विनय किया है। वनिता जी की बहू के आश्चर्य से अपनी सास को किसी अजूबे की तरह देख रही थी, लेकिन उसके मुंह से बोल नहीं निकल पा रहे थे, क्योंकि उसे अपने मायके और ससुराल के स्तर का अंतर उसके सामने उत्तर बनकर खड़ा हो गया था।और तब तक वे गाड़ी के पास आ चुकी थीं। पोते ने गाड़ी में दादी को पकड़ कर गाड़ी में बैठने में मदद का उपक्रम किया, जैसे दादी की जिम्मेदारी उसी के ऊपर हो। वनिता जी बलिहारी नजरों से सांस और बेटे को देखती रही फिर उनके साथ ही गाड़ी में बैठते हुए ड्राइवर को चलने का आदेश सुनाया। गाड़ी रफ्तार से आगे बढ़ने लगी। उसके मन में सांस के लिए श्रद्धा का भाव हिलोरें मार रहा था। उसने सांस के कंधे पर अपना सिर रख दिया।

*सुधीर श्रीवास्तव

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