कविता

कुदरत की मार

यह कैसी विडम्बना है
कि कुदरत भी हम पर ही
जुल्मों सितम ढाती है,
शायद वो भी हमारी बेबसी का
मजाक उड़ाकर बड़ा सुकून पाती है।
ऐसा नहीं है तो फिर बताओ ये क्या हो रहा है,
बारिश के बीच रिक्शे की सीट पर बैठे
आखिर मुझे क्या मिल रहा है?
कोई सवारी जब मुझे नहीं मिल रहा है,
तब शाम का चूल्हा कैसे जलेगा
ये सोचकर भी मेरा मन कांप रहा है।
बीबी बच्चे मेरी राह देख रहे होंगे
घर पहुंचकर उनसे क्या कहूंगा?
किस मुंह से उन्हें मुँह ढांपकर,
पेट दबाकर सो जाओ कह सकूंगा?
नहीं नहीं मैं ऐसा न कर सकूंगा
न घर लौट सकूंगा।
पर इससे तो उनकी चिंता ही बढ़ाऊंगा
इसलिए ये भी न कर पाऊंगा?
थोड़ा देर से ही सही घर तो जाना ही पड़ेगा,
कुदरत के मार से अपनी जुड़ी कहानी
परिवार सुनाकर सुलाना ही पड़ेगा,
अपने आप से मुँह चुराना ही पड़ेगा,
क्योंकि जीने के लिए देखते हैं
और क्या क्या सहना पड़़े़।गा

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921