कविता

चितभामिनी

मनमोहनी, चितभामिनी,

करती शृंगार नितयामिनी।

नार नवेली, गजगामिनी,

मुझको रिझाये क्यूँ कामिनी ?

मदभरी उदित तेरी यौवना,

खनका न चूड़ी कँगना।

भर लूँ न मैं आलिंगना,

अनुरागी हूँ मैं आशना।

प्रेम हया में तेरे झूके नयन,

नथ कहे री उतार सजन।

जले मेरा तन ये कैसी अगन,

कर अंगीकार और बुझा तपन।।

चूमूंँ मैं लब औ रची हथेलियाँ,

सहुँ मैं दंश औ देह की उर्मियाँ।

करूँ मैं समर्पण अर्थ बोलियांँ,

यूँहिं छायी रहे मदहोशियांँ।।

उद्वेग बढ़ाती ये अंगभंगिमा,

शनै: वैकुंठ पाती देहउष्णिमा।

सौंपू मैं, तू मुझको सौंप प्रियतमा,

हुए दो मन अब एक आत्मा।।

— राजश्री राज 

राजश्री राज

पिता का नाम - स्व. श्री प्रेमशंकर प्रसाद माता का नाम - स्व. श्रीमती गायत्री देवी पति का नाम - श्री राम जन्म प्रसाद शिक्षा - बी.एस.सी. आॕनर्स (जूलाॕजी) व्यवसाय - रन प्ले स्कूल अभिरुचि - लेखन के साथ-साथ पेंटिंग और प्ले सींथेसाइजर प्रकाशित संकलन - साझा संकलन (काव्यसागर, करोना काल, सावन की फुहार, मातृत्व, साहित्योदय पत्रिका) पता- Qr.No. - A/ll - 135(T) In front of home gaurd training center H.E.C. Colony Dhurwa Ranchi 834004