दीवार – ए- जिंदगी
यह कैसी बेवकूफी है,
हमें समझ में नहीं आता है।
एक महफ़िल की शान था मैं,
एक दीवार आज़ टूटा है फिर आज़,
लोगों को समझ में,
बिल्कुल नहीं आता।
सब खुशियां मना रहे हैं,
एक ईंट की बेवफाई पे,
हमें आनन्द और संतुष्टि देने की,
कोशिश की जा रही है,
इसकी रूसबाई पर।
यही इल्म हासिल करने की जरूरत है,
कम उम्र हो रही है,
इसकी मतलब समझने पर।
यही तो नादानी है,
मुर्खतापूर्ण कहानी है।
हमें आज़ इस बात को समझने की जरूरत है,
कम हो रही उम्र पर,
समझने की कोशिश करनी चाहिए,
यही सबसे बड़ी हिम्मत है।
— डॉ. अशोक, पटना
