रीत को बोझ न बनने दे
लूट के बाजार में,आज गजब हो गया
लूटने वाली सालियाँ,सबको सीख दे गया
थी जूता रस्म की छिपाई
खुले महफ़िल से चुराई
मन में अजीब उत्साह लिए
विवाह में खुशी अथाह लिए
चोली-घाघरा बन-ठन के
हँसी मजाक करते गन-गन के
पूरे मंडप की रौनक बन
बारातियों के मचलते मन।
थी उनकी पूरी पलटन
जीजा जी को लूटने की जतन
तिलक-भाँवर की रीत पूरी हुई
जूता पहनाने की प्रथा शुरू हुई
जूते के बदले बीस हजार माँग डाले
हँसती-खेलती मंडली में खलल डाले
सुनने वाले हो गए हक्के-बक्के
दूल्हा भी हो गए भौच्चके
दूल्हा के जीजा जी बोले-
कुछ नोट को गिनने दे
और सामने देकर कहा
रीत को बोझ न बनने दे।
खुशी-खुशी स्वीकार कर लिए
हँसती-हँसती सबका आभार किए ।
न जिद,न गुस्सा,न अजनबीपन
सबको सीख दी और खूब अपनापन।।
— चन्द्रकांत खुंटे ‘क्रांति’
