गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

उस की सता को दबाया जा रहा।
शहर सारे को सजाया जा रहा।
उस का हंसना गगन को है छू रहा,
आंख से आंसू छुपाया जा रहा।
फिर गुलामी के मिले संकेत कुछ,
शहर का हिस्सा चुराया जा रहा।
पुलिस की तफ़तीश कितनी अच्छी है,
दोषियों को खुद बचाया जा रहा।
सिर्फ बेकारी का मुख्य आशय है,
मिट्टी में हीरा रूलाया जा रहा।
इक क्रान्ति के बुरे निर्देश हैं,
नीर अग्नि से बुझाया जा रहा।
कैसे निखरेंगी कला की कृतियां,
रिक्त पायल से नचाया जा रहा।
रिश्तों में सत्कार का महत्व नहीं,
बदतमीज़ी से बुलाया जा रहा।
चांद तारों की है सता रात में,
गगन में सुरज छुपाया जा रहा।
घर ग़रीबों के हैं तोड़े जा रहे,
फिर अमीरों को बसाया जा रहा।
किस तरह माचिस की तीली फूंकना,
बंदरों को भी है सिखाया जा रहा।
बालमा नगरी में फैला ज़हर है,
पाठ ऐसा ही पढ़ाया जा रहा।

— बलविन्दर बालम

बलविन्दर ‘बालम’

ओंकार नगर, गुरदासपुर (पंजाब) मो. 98156 25409