लघुकथा

लघुकथा- फ़ख़्र

पापा आप कब आयेंगे? कितने दिन हो गए आपको ऑफिस के काम से गए हुए। आपने कहा था चार-पाँच दिन में आ जायेंगे। आज पूरे दस दिन बीत गये … आपका कहीं पता नहीं है। सब लोग ढूँढ कर हार गए, पुलिस भी हताश हो गई है।’ मीता ख़ुद से बातें किए जा रही थी, उसकी आँखें नम थीं।
हर दिन, घर के सामने बने पार्क में बेंच पर आकर बैठ जाती और अपने पिता को याद करती, जो उसको कितना प्यार दुलार करते थे। जिनके बिना सारी दुनिया सूनी लग रही थी। उसके पिता किसी काम के सिलसिले में बाहर गए थे। पिता ने घर में सभी को कह रखा था, “मेरे आने-जाने के बारे में कभी किसी को कुछ मत बताना… “
अचानक छोटी बहन सामने से दौड़ती हुए आई, “दीदी चलो, कुछ पुलिस वाले और पापा के ऑफिस के लोग आए हैं।”
“क्या?” मीता एक भी पल गँवाये बिना घर की ओर दौड़ पड़ी, “पापा-पापा… क्या हुआ मेरे पापा को …!”
उसने देखा, मम्मी उन लोगों से पापा के बारे में बेसब्री से पूछ रही थीं। एक पुलिस वाले ने कहा, “मैडम! आपके पति ठीक हैं, बस उनकी बायीं पसली में गोली लगी है, अस्पताल में हैं… अब खतरे से बाहर हैं।”
तभी आफ़िस के बड़े अधिकारी बोल पड़े, “बहन जी, उन्होंने बड़ी बहादुरी से देश के अन्दर छुपे आतंकी दुश्मनों का पता लगा कर, कई लोगों का सफाया कर दिया है। इसी से तो उनका नाम रॉ के बहादुर अफ़सरों में गिना जाता है, हम सभी को उन पर फ़ख़्र है।”

— नलिनी श्रीवास्तव ‘नील’

नलिनी श्रीवास्तव ‘नील’

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