ग़ज़ल
जब हम इनको सुलझाते हैं,
कुछ धागे कट भी जाते हैं।
वो ख़ंजर से भी घातक हैं,
जो ज़ख़्मों पर मंडलाते हैं।
मौसम में कुहरा होने पर,
वाहन अक्सर टकराते हैं।
मुफ़लिस मां बन भी जाये पर,
बच्चे कम ही बच पाते हैं।
मजबूरी में बिकने वाले ,
बेहद कम क़ीमत पाते हैं।
खेतों से घर तक आते में,
कितने गन्ने लुट जाते हैं।
वो जब मेले में जाती है,
उससे कितने टकराते हैं।
कम्बल हल्का है तो क्या हम,
दोनों मिलकर सो जाते हैं।
ग़ुंचे भी लगते हैं ज़ेवर,
वो जब मुझको पहनाते हैं।
वो रोटी मीठी लगती है,
हम जिसको मिलकर खाते हैं।
–अरुण शर्मा साहिबाबादी
