अंजूरी
बूँद-बूँद कर बरसूँगी
अंजूरी में भर लेना।
छलक पड़े जो हाथ से
फिर अधर पर धर लेना।
उतर गई जो हृदय तक
वहीं मेरा निलय होगा
संजो लिए हर बूँद तो
तुझमे ही विलय होगा।
अंकुरित होकर चाहतें
झूम झूम इतराएंगी
स्नेह लेप जो लगाओगे
फिर तो लहलहाएंगी।
— सविता सिंह मीरा
