उपासे नयन
श्रंगार अहो कैसे कर लें
नयना चंचल तो उपासे हैं।
कल घन अंबर का हुआ मिलन
आकुल हृदय अभी प्यासे हैं।
आञ्जन नैना के पूछ रहे
क्यों आनन हुआ है स्याह सखे?
क्या रात शलभ ने छेड़ा था
या निकली अँसूवन से धाह सखे।
चंदा को भरकर बाहों में
वह सिसक रही थी भर निशा
ढूँढ़े निर्मोही राहों में
ताके नैना भी चँहू दिशा।
कब आएंगे मेरे राघव
मुक्त अहिल्या करने को।
या आ जाओ बनकर माधव
मीरा के गरल को हरने को।
— सविता सिंह मीरा
