ग़ज़ल
बालम पानी दूर बहुत है
पर यह दिल मज़बूर बहुत है
बेशक शीशा टूट गया है,
किरचियां भीतर नूर बहुत है।
जाने को फिर ज़िद करता है,
आने को मज़बूर बहुत है।
घर में उस को कोई ना जाने,
वैसे वह मशहूर बहुत है।
पानी बींच पतासा घुलता,
सुन्दर रूप ग़रूर बहुत है
बाहर से है लीपा पोती,
दिल अंदर तंदूर बहुत है।
पहले माफ़ी मांग चुका है,
छोडो और हज़ूर बहुत है।
डाली-डाली झुकती जाए,
आम की डाली बूर बहुत है।
हर राही का दिल ललचाए,
डाली पर अंगूर बहुत है।
शिक्षा घर-घर पहुंच गई है,
नगरी में मज़दूर बहुत है।
रातें भी परवाह नहीं करतीं,
सूरज भी मग़रूर बहुत है।
बालम बंधन उम्रों का है,
ज़ख़म अभी नासूर बहुत है।
— बलविंदर बालम
